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गुरुवार, 19 सितंबर 2013

बात तो सोची थी बरसों पहले जुबां से मगर आज ही निकली

बात तो सोची थी
बरसों पहले
जुबां से मगर
आज ही निकली
कैसा होता अगर ये
दुनिया ना होती
ये लोग ना होते
धरती पर केवल 
हरे भरे फल फूलों से 
लदे वृक्ष होते
गगन में
उड़ते मस्त परिंदे होते
मीठे जल के सोते होते
लहराती 
बहती नदियाँ होती
इठलाता
मचलता सागर होता
बादल पहाड़ों से
अठखेलियाँ करते
हर गले को वर्षा
तर करती
झूमती हवाएं संगीत
सुनाती
कोई किसी से इर्ष्या
ना करता
द्वेष का तो 
नाम तक ना होता
तेरा मेरा 
कोई ना जानता
सब जीते 
औरों को जीने देते 
बात तो
सोची थी बरसों पहले
जुबां से
मगर आज ही निकली
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
41-285-19-09-2013
प्रक्रति ,वृक्ष,पर्यायवरण,समय,जीवन, इर्ष्या,दुनिया,जीवन मन्त्र 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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