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बुधवार, 18 सितंबर 2013

इंसान से नहीं उसकी आँखों से डरने लगा हूँ


अब इंसान से नहीं
उसकी आँखों से 
डरने लगा हूँ
हर वक़्त शक से 
देखती हैं
हर लम्हा मुझे 
तोलती हैं
अपना दुश्मन समझती हैं
घबरा कर हाथों में
चेहरा भी छुपा लूं
तो सरे आम पूछती हैं
जब मन में चोर नहीं है
फिर चेहरा क्यों छुपाया
ना खुद सुकून से 
रहती हैं
ना मुझे सुकून से 
रहने देती हैं
हर वक़्त मुझे 
घूरती रहती हैं 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
38-282-18-09-2013
शक,आँखें,अविश्वास,जीवन,जीवन मन्त्र    

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