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शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

मन की खिड़कियाँ


मन की खिड़कियाँ
कितनी भी खुली हो
मन के आँगन में अगर
नकारात्मकता की
धूल ज़मी हो 
सकारात्मकता की
ताज़ी हवा भी
मन की धूल
साफ़ नहीं कर सकती
मन को
नकारात्मकता की
धूल से बचाने के लिए
स्वयं पर विश्वास का
होना आवश्यक होता है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
30-274-13-09-2013
  

सोच,जीवन,जीवन मन्त्र ,विश्वास , नकारात्मकता ,सकारात्मकता

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