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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

प्रेम की प्यास


नदी जब तक 
समुद्र से 
मिलती नहीं 
प्रेम की प्यास
बुझती नहीं
व्याकुलता में
अनमने भाव से
बहती रहती
क्रोध में कहीं
कोई नाव उलटती
डूबा कर
कोई जान लेती
बस्तियां
जलमग्न करती
जब तक
मिलन नहीं होता
समुद्र से
शांत नहीं होती
लक्ष्य से
मिलन होते ही
प्रेम में डूब जाती
सदा के लिए
उसमें समा जाती 

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
29-273-12-09-2013
प्रेम ,प्यार ,व्याकुलता ,मिलन ,जीवन,मोहब्बत

 डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

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