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बुधवार, 21 अगस्त 2013

मैंने सोचा था बड़े घर की लड़की है

मैंने सोचा था
बड़े घर की लड़की है
हथेलियों में पली है
गाडी में चली है
सुरक्षा की 
चारदीवारियों में बड़ी हुई है
इसने क्या सहा होगा
इसे किसने घूरा होगा
बुरी नज़रों से देखा होगा
जब एक दिन 
अकेले में रोते देखा
लडकी होने पर 
खुद को कोसते देखा
तो रहा नहीं गया
उससे पूछ लिया
तुम्हें क्या दुःख हो सकता है
रोते रोते वह कहने लगी
मेरे देश में 
अब लड़की होना ही
सबसे बड़ा दुःख हो गया है
जन्म से पहले ही उसे
अभिशाप समझा जाना लगा है
जन्म ले भी ले तो भी
इज्ज़त बचाने के खातिर
जिंदगी भर डर कर
जीना पड़ता है
आज से पहले तक तो
खुद को बचा पायी थी
मगर आज खुद को
बचा नहीं पायी
हवस की बलि चढ़ाई गयी
उसकी बात सुन कर
मुझे भी रुलाई आ गयी
अपने पुरुष होने पर मन में
पहली बार ग्लानि हुई
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
75-212-21-08-2013
नारी,स्त्री,लड़की,जीवन,बलात्कार,महिला,मार्मिक
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

















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