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रविवार, 25 अगस्त 2013

वो प्रियतमा के ख़त का ज़माना


नम कर देता हैं 
आँखें
भुलाए नहीं भूलता
वो प्रियतमा के 
ख़त का ज़माना
याद आता है ख़त को
बार बार पढ़ना
सीने से लगाना
आँखें बंद कर
जी भर के चूमना 
कभी किताब में
कभी अलमारी में
कभी कपड़ों के
बीच छुपाना
जेब में छुपा कर
एकांत में पढ़ना
कभी मुस्काराना
कभी शरमाना
प्रियतमा से मिलन के
ख़्वाबों में खो जाना
आता नहीं जब तक
खिड़की से
सड़क पर झांकना
डाकिये की राह में
बार बार
घडी को ताकना
बेचैनी से
ऊँगलियाँ चटखाना
कमरे में
इधर उधर घूमना
नज़रें दरवाज़े की
कुण्डी पर अटकती
कब आयेगा डाकिया
लाएगा
प्रेम से भीगा
भावनाओं से भरा
प्रियतमा के नाज़ुक
हाथों से लिखा
सबसे न्यारा
सबसे दुलारा
मन भावन
ख़त प्यारा प्यारा
नम कर देता हैं
आँखें
भुलाए नहीं भूलता
वो प्रियतम के
ख़त का ज़माना

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
87-222-25-08-2013

ख़त.प्रेम,प्रियतमा,यादें ,ज़माना,चिट्ठी,डाकिया 

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