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शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

मेरा वतन लुट रहा है,मेरा चमन लुट रहा है


मेरा वतन लुट रहा है
मेरा चमन लुट रहा है
हर दिन सियासत का
नया खेल हो रहा है
मोहब्बत के पौधों को
उखाड़ा जा रहा है
नफरत के काँटों को
रोज़ बोया जा रहा है
महकती थी फिजायें
जिसकी कभी
मोहब्बत के फूलों से
उन फिजाओं में अब
ज़हर घोला जा रहा है
इंसानियत को हर दिन
दफनाया जा रहा है
भाई को भाई से
लड़ाया जा रहा है
सियासत के खातिर
हैवान पूजा जा रहा है
मेरा वतन लुट रहा है
मेरा चमन लुट रहा है
04-143-2-08-2013
वतन,देश,नफरत,सियासत ,चमन

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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