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शनिवार, 31 अगस्त 2013

करना भी होता है


रात भर सोचता रहा
अनभूतियों से भरी
यादगार रचना लिखूं
पाठकों के मन को
झंझोड़ कर रख दूं
सोचने पर मजबूर कर दूं
रात गुजर गयी
कलम हाथ में रह गयी
रचना का
सृजन तो हो नहीं पाया
पर मन अशांत हो गया
अनिद्रा से आँखें
लाल हो गयीं
ऊँगलियाँ दर्द करने लगी
सुबह होते होते
समझ में आ गया
केवल सोचने से
काम नहीं चलता
करना भी होता है
108-242-31-08-2013

जीवन, जीवन अमृत,कर्म,सोच,सोचना, सृजन
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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