ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

सोमवार, 26 अगस्त 2013

वो आँगन

पुराने घर के
आँगन में पहुँचते ही
यादों के समुद्र में
गोते लगाने लगता हूँ
वो आँगन ,
साधारण आँगन नहीं
मेरे बचपन का संसार था
कई परिवारों का
मिल जुल कर रहना
दोस्तों के साथ खेलना
नाहना दौड़ना मचलना
रूठना मनाना
उसी आँगन में होता था
उसकी चारदीवारियों में ही
बचपन का हर पल गुजरा था
जीवन का हर रूप दिखा था
इच्छाओं आकान्शाओं का
जन्म हुआ था
प्रेम से पहला
परिचय हुआ हुआ था
उस आँगन में ही
पहली बार जाना था
जीवन सांस लेना ही नहीं
उससे अधिक होता है
यादों के समुद्र से
बाहर निकला तो
मन में ख्याल आया
काश ऐसा आँगन हर
इंसान के भाग्य में होता
बचपन में ही जीवन का
आइना दिख जाता

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
89-224-26-08-2013
जीवन,आँगन,बचपन , यादें ,जीवन अमृत
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें