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सोमवार, 26 अगस्त 2013

कलम हाथ में लेते ही


कलम हाथ में लेते ही
मेरा चंचल मन
ना जाने कहाँ से
आश्वासन पाता है
शरीर की सारी थकान
मिट जाती है,
ऊंगलियों में ऊर्जा का
संचार होने लगता है
निर्बाध गति से विचारों का
प्रवाह होने लगता है
आस पास का शोर भी
मेरा ध्यान भंग नहीं करता
व्यथाएं दुबकने लगती हैं
प्रतीत होने लगता है
लिखना ही मेरा ध्यान है
लिखना ही परमात्मा है
लिखना ही जीवन यात्रा है
अब मुझे मंदिर जाने की
आवश्यकता नहीं
मेरी कलम भी
बार बार वही लिखती है
जो परमात्मा चाहता है
मुझे विश्वास होने लगता है
जीवन भर जिस लक्ष्य को
पाने के लिए भटकता रहा
वह अब दूर नहीं है   
90-225-26-08-2013
लक्ष्य, परमात्मा,मन,कलम,जीवन, ध्यान
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

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