ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

सोमवार, 5 अगस्त 2013

शर्म बोली हया से


सिसकियाँ लेते हुए
शर्म हया से 
बोली
बहन समय ने
कैसी पलटी खाई है
हमारी कितनी दुर्गति
हो रही है
दिन पर दिन इज्ज़त
धूल में मिल रही है
पहले हमसे लोग
कितना डरते थे
हमारे ख्याल भर से
घबराते थे
अब दिलों से
दूध में मक्खी की तरह
निकाली जा रहीं हैं
नैतिकता की
बलि चढ़ाई जा रही है
यही हाल रहा तो
वह दिन दूर नहीं
जब डरना तो दूर
धरती पर हमारा
नाम तक लेने वाला भी
नहीं बचेगा कोई



© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

15-154-5-08-2013

शर्म ,हया, इज्ज़त, जीवन, नैतिकता 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें