ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

भ्रम जाल में फंसा दानव बन रहा इंसान

रोता है मन
तड़पता है मन
जब देखता है
रोता हुआ बचपन
घबराई हुई जवानी
सहमा हुआ बुढापा
दरकती निष्ठाएं
खोखले रिश्ते
स्वार्थ का विस्तार
चरित्र का हनन
नारी का उत्पीडन
निर्बल पर प्रहार
शक का प्रभाव
बढ़ती हुए हवस
होड़ का वर्चस्व
माया मोह से प्यार
बुजुर्गों का अपमान,
पथ भ्रष्ट संतान
माताओं का बिलखना
ईमान का बिकना
धर्म का व्यापार
झूठ का साम्राज्य 
रोता है मन
तड़पता है मन
जब देखता है
भ्रम जाल में फंसा
दानव बन रहा इंसान
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
92-227-27-08-2013
कर्म,भ्रम, जीवन अमृत ,जीवन, बचपन,जवानी,बुढापा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें