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शनिवार, 24 अगस्त 2013

उससे ताल्लुक था,अब भी है मगर नहीं भी



 उससे ताल्लुक था
अब भी है मगर नहीं भी
कभी मिला तो नहीं
मगर देखा कई बार
जब भी करीब से 
देखने की ख्वाहिश करता
मिलने की कोशिश करता
कदम आगे बढाता
वो भीड़ में गुम हो जाती
भीड़ का ज़र्रा ज़र्रा छानता
मगर वो नज़र नहीं आती
फिर आने के लिए
मुंह लटका कर लौट जाता
अगले दिन फिर उसका
चेहरा नज़र आ जाता
सांप सीढी का खेल
महीनों चलता रहा
मगर कभी मिलना नहीं हुआ
उस तक पहुँचने से पहले ही 
किस्मत का सांप
ख्वाहिशों को डस लेता
जब भी यादों की
गलियों में घूमता हूँ
मन कुलबुलाने लगता है
दिल मिलने को तड़पता है
उससे ताल्लुक था
अब भी है मगर नहीं भी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
82-219-24-08-2013
ताल्लुक,मोहब्बत,रिश्ता,प्यार
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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