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शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

आज जब नानी की बात चली

आज जब 
नानी की बात चली 
मन के कोने में दबी 
नानी की एक एक 
बात याद आने लगी 
उनके अल्हड़पन की 
सुनहरी कहानी 
आँखों को नम कर गयी
तूँ इतना ही रहेगा 
या कभी बड़ा भी होगा 
नानी का इतना सा कहना 
बचपन में 
मुझे कभी नहीं भाया 
मुझे लगता जैसे नानी ने 
मेरे आत्म सामान को 
ललकारा 
उत्तर में जब नानी को 
मचल कर कहता था 
नानी हर साल बड़ा 
हो रहा हूँ
फिर भी तुम हर साल 
यही बात कहती हो
उत्तर में हँस कर नानी 
कहती थी 
तूँ बड़ा हो गया तो 
क्या हुआ 
मैं भी तो साल भर 
बड़ी हो गयी
मेरे लिए तो उतना ही रहा
मेरे बड़े होने को लेकर 
मेरा और नानी का 
मन मुटाव 
उनके जीवित रहने तक 
चलता रहा 
अब जब नानी संसार से 
विदा हो चुकी हैं 
उनकी बातें मुझे व्यथित 
करने के लिए रह गयी 
उनके नाती से उनकी बात 
उनका अल्हड़पन ही था
बूढ़ी उम्र में भी उनका 
बचपन जीवित था 
उसका सुहावना दर्शन 
मेरा सोभाग्य था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-142-2-08-2013

बचपन,नानी,जीवन,यादें.अल्हड़पन

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