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बुधवार, 14 अगस्त 2013

मन मस्तिष्क में सामंजस्य नहीं हो तो


(जीवन अमृत )
कल रात
आँखें भारी होने लगी
नींद बुलाने लगी
बिस्तर पर लेट कर
नींद की प्रतीक्षा करने लगा
अचानक मन कहने लगा
नींद बहुत सताती है
कितने नखरे करती है
लेटते ही
क्यों नहीं आती है
मस्तिष्क ने सुना तो
बोल उठा
नींद जादू नहीं है
जो पलक झपकते ही
आ जायेगी
मन को मस्तिष्क का
कहना अच्छा नहीं लगा
दोनों में द्वंद्व
प्रारम्भ हो गया
रात बिना नींद के
गुजर गयी
सुबह हुई तो एक बात
अवश्य समझ आ गयी
मन मस्तिष्क में
सामंजस्य नहीं हो तो
ना मन को चैन मिलता
ना ही मस्तिष्क शांत रहता
गहरी नींद में सोना हो तो
मन बेचैन
मस्तिष्क अशांत नहीं
होना चाहिए
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
53-190-14-08-2013
जीवन अमृत, ,जीवन,मन मस्तिष्क,सामंजस्य,नींद

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