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मंगलवार, 20 अगस्त 2013

मैं नहीं मेरा मन लिखता है


कैसे समझाऊँ ?
मैं नहीं
मेरा मन लिखता है
मन में भी लिखा तो
पहले से रहता है
जो देखा सुना सहा
मन के नेपथ्य में
छुपा रहता है
कलम हाथ में लेते ही
मन हिलोरें लेने लगता
पानी से लबालब भरे
बाँध सा उफनने लगता
विचारों का प्रवाह
कलम की नालियों से
उन्मुक्त बहने लगता
कैसे समझाऊँ?
मैं नहीं
मेरा मन लिखता है

डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर
71-208-20-08-2013

कविता,मन,लेखन,विचार,जीवन,कलम

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