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शनिवार, 10 अगस्त 2013

निर्धन नारी का हर दिन इकसार होता है


निर्धन नारी का
हर दिन इकसार होता है
सुबह चूल्हे से प्रारम्भ होती है
दोपहर दो जून रोटी के लिए
कड़ी मेहनत में गुजरती है
रात को वैवाहिक रिश्ते की
आग शरीर को जलाती है
यही उसका
आमोद प्रमोद होता है
किस दिन को
अच्छा किस दिन को बुरा कहे
उसका हर दिन ऐसे ही गुजरता है
कभी बीमारी से शरीर टूटता है
कभी बच्चों के लिए रोना पड़ता है
कभी ज़माने के
तानों से दिल जलता है
निर्धन नारी का
हर वार त्योंहार ऐसा ही होता है
हर दिन
कुछ ना कुछ सहना होता है
ज़िन्दगी भर
मर मर कर जीना होता है
निर्धन नारी का
हर दिन इकसार होता है
जीवन उसका अभिशाप होता है
34-173-10-08-2013

जीवन,जिंदगी,निर्धन,निर्धन,निर्धनता ,नारी
 डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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