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गुरुवार, 18 जुलाई 2013

मन के बीहड़ में


मन के बीहड़ में
जब बहम की दीमक
पाँव फैलाने लगती हैं
विश्वास के वृक्षों की
जडें खोखली होने
लगती हैं
वृक्ष सूखने लगते हैं
अविश्वास की
कंटीली झाड़ियाँ
जन्म लेने लगती हैं
हिम्मत की मिट्टी
भुरभुरी हो कर
धसने लगती है
जीवन की गति
धीमी हो कर
पथ से भटकने
लगती है
किसी की सलाह
काम नहीं आती है
हर बात कडवी
लगती है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-113-18-07-2013
बहम,जीवन, अविश्वास

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