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गुरुवार, 25 जुलाई 2013

गुलमोहर

घर  के बाहर लगा
गुलमोहर का पेड
मेरे जीवन का 
मूक साथी ही नहीं 
रिश्तों का अटूट दर्पण भी है
दादाजी ने बचपन में
नित्य पानी से सींचने के
सार सम्हाल करते रहने के 
सख्त निर्देशों के साथ
इसे अपने सामने 
मेरे हाथों से 
धरती में लगवाया था  
तब से अब तक इसकी 
देखभाल करता रहा हूँ 
उम्र के इस पड़ाव तक
इसने भी मेरा 
भरपूर साथ निभाया 
जब भी व्यथित होता हूँ
गुलमोहर की छाया के
नीचे जा बैठता हूँ
कुछ समय में ही  
स्वयं को सहज पाता हूँ
प्रतीत होता है
गुलमोहर 
मेरी भावनाओं को 
समझता है
मुझे सांत्वना देता है
सुनहरी लाल पीले फूल
घर की शोभा 
उल्लास का वातावरण 
बढाते रहे हैं 
छोटी छोटी सुर्ख 
हरी पत्तियाँ
जीवन में हरियाली का 
आभास देती रहीं हैं 
शाखाओं पर बैठने वाले 
पक्षियों की चचाहट ने
मुझे कभी अकेलेपन का
अहसास नहीं होने दिया
अब जब उम्र की शाम है
आगे जीवन की अंधेरी 
रात है,
मेरी तरह गुलमोहर भी 
ढलने लगा है
पतियाँ डालियाँ भी 
कम हो गयीं
देख कर पता चलता है 
अब वह भी थकने लगा है 
जब भी इसे देखता हूँ
भगवान् से प्रार्थना करता हूँ
इसने जीवन भर मेरा 
साथ निभाया
अंतिम समय तक 
मेरा साथ निभाता रहे
मेरे संसार से जाने के 
साथ ही
यह भी प्राण छोड़ दे
पता नहीं 
बाद में कोई इसका 
ध्यान रख पायेगा या नहीं
मैं नहीं चाहता मेरे बाद
कोई इसकी उपेक्षा करे
इसे दुःख पहुंचाए
इसका दुःख केवल मात्र 
इसका ही नहीं
मेरा भी दुःख होगा 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
34-126-25-07-2013
जीवन ,गुलमोहर,साथी,मित्र,बुढापा,भावनाएं,पेड

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