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मंगलवार, 30 जुलाई 2013

परम्पराओं का संसार

काल बदला
समय बदला 
पंचांग बदला
नहीं बदला तो
परम्पराओं का
संसार नहीं बदला
सदियों से
जंजीरों में जकड़ा
मान्यताओं का
ताला नहीं खुला
जीना कितना भी
दूभर लगे
मन पीड़ा से रोता रहे
दर्द से  
ह्रदय चीत्कार करे
मगर भीड़ से
पीछा नहीं छूटा
जो मन चाहता
कभी कर नहीं सका
स्वयं मनुष्य की 
बनायी
सीमाओं में बंधा
एक बार भीड़ का
अंश बना
फिर कभी निकल 
ना सका
जीवन पर्यन्त
छटपटाता रहा
पिंजरे में बंद पंछी सा
फडफडाता रहा
मगर परम्पराओं का
चक्रव्यूह 

तोड़ नहीं सका
स्वछन्द उड़ने की इच्छा
मन में दबाये संसार से
अतृप्त चला गया


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
43-135-30-07-2013

भीड़,मान्यताएं ,परम्परा,जीवन,इच्छा,इच्छाएं

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