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शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

कहीं बम फटे


कहीं बम फटे
मैं शक से देखा जाता हूँ
खाकी निकर पहन कर
निकलता हूँ
तो काफिर कहलाता हूँ
कहीं मस्जिद में
कुछ फेंका जाता है
मुझे पकड़ा जाता है
कोई मंदिर को
गंदा करता है
मुझे कसूरवार
ठहराया जाता है
जबकि सच तो यह है
मैं एक गरीब आदमी हूँ
अपने पेट के लिए
दिन भर मेहनत करता हूँ
मुश्किल से चंद रूपये
कमाता हूँ
मेरा भी दिल रोता है
जब भी किसी
मंदिर मस्जिद में
कुछ अनचाहा होता है
फिर भी कोई मुझे
मुसलमान कहता है
कोई मुझे
हिन्दू मानता है
ये सब नेताओं के
दिमाग की
धर्मान्धता की
संकुचित सोच की
गन्दी राजनीति की
उपज है
मैं तो खुद को
इस देश का साधारण
नागरिक समझता हूँ
समझता था
समझता रहूँगा
39-131-26-07-2013
राजनीति,धर्मान्धता,मंदिर मस्जिद,संकुचित सोच, मुसलमान ,हिन्दू

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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