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रविवार, 21 जुलाई 2013

बात करने में क्या बिगड़ता है


जब लोगों को
कहते सुनता हूँ
बात करने में
क्या बिगड़ता है
बड़े बोल बोलने में
क्या जाता है
सोचने लगता हूँ
कितना अच्छा होता
अगर वास्तव में 
इन का कुछ चला जाता
सच्ची बात
कहना तो सीख जाते
जितना आवश्यक
उतना ही बोलते
लोगों की नज़रों में
तो नहीं खटकते
खुद भी
कुंठा रहित जीते
दूसरों को भी जीने देते
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर –अजमेर
26-118-20-07-2013
कुंठा,जीवन,बड़े बोल

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