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शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

सब्र का पैमाना

लोगों के सब्र का 
पैमाना
इतना छलक चुका है
अहम् इतना बढ़ चुका है
कौन कब रूठ जाएगा
अब पता ही नहीं चलता
बात सोच समझ कर
कही गयी हो
जाने अनजाने में मुंह से
निकली हो
कौन सी बात कब शूल
जैसे चुभ जाएगी
मन में आग लगाएगी
पता ही नहीं चलता
भले के लिए दी गयी
सीख भी कब तांडव
मचाएगी
रिश्तों को जला कर
ख़ाक कर देगी
मामूली हँसी ठिठोली
कब वीभत्स रूप ले लेगी
कोई नहीं जानता
कौन कब रूठ जाएगा
अब पता नहीं चलता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
22-114-19-07-2013
सब्र,अहम् सहनशीलता,जीवन,

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