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गुरुवार, 14 मार्च 2013

आदत से मजबूर हूँ



बार बार समझाता हूँ
बार बार पूछता हूँ
क्यों क्रोध करते हो
बात बात में चिढते हो
क्या धैर्य धीरज भूल गए
सहनशीलता से भी
रुष्ट हो गए
जब पहले कभी
क्रोध से समस्याओं का
समाधान नहीं हुआ
अब कैसे हो जाएगा
तुम्हारा खून अवश्य जलेगा
रिश्तों में खटास
मन में तनाव भी बढेगा
तुम कहोगे
बार बार एक ही बात
क्यों दोहराता हूँ
मैं भी जानता हूँ
क्रोध घातक होता है
पर क्या करूँ
आदत से मजबूर हूँ
मैं भी कह देता हूँ
अग्रज होने के कारण
तुम्हें समझाना
मेरा कर्तव्य है
जब तक कर्तव्य अधूरा है
हिम्मत नहीं हारना
मेरी आदत है
मैं भी आदत से 
मजबूर हूँ

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
26-26-14-01-2013    
क्रोध, कर्तव्य, आदत
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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