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बुधवार, 13 मार्च 2013

अहम् की गांठें



अहम् की गांठें
खुल जाती अगर
रिश्तों की रस्सी के
बल सुलझ जाते
रिश्तों में
पवित्रता आ जाती
अपने पराये ना बनते
सड़क पर चलने वाले
पराये कम
अपने अधिक होते
अपने अपने ही नहीं
ह्रदय के हिस्से होते

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
24-24-13-01-2013  
अहम्,रिश्ते,
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  

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