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सोमवार, 11 मार्च 2013

क्यों तुझे आइना कहते हैं


तूँ बड़ा ही अजीब है
तेरा कोई सानी नहीं
जहां टांगो
खामोशी से वहां 
टंग जाता है
न कभी कुछ कहता
ना नाज़ नखरे दिखाता
हाथ हिलाऊँ
मुंह बिचकाऊँ
बाल बनाऊ या ढाढी
तूँ भी वैसे ही करता है
जैसा मैं दिखता हूँ
वैसा ही दिखाता है
मन करता है
कभी तुझ से ही पूछ लूं
तूँ ऐसा क्यों करता है
पर जानता हूँ
आज तक किसी को
कुछ नहीं बताया तो
मुझे क्यों बताएगा
 मन मसोस कर
रह जाता हूँ
पता नहीं क्यों  
लोग तुझे आइना 
कहते हैं
मुझे तो तूँ 
अव्वल दर्जे का 
नकलची लगता है


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

20-20-011-01-2013
आइना ,नकलची

1 टिप्पणी:

  1. बहुत उम्दा प्रस्तुति आभार

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

    आप मेरे भी ब्लॉग का अनुसरण करे

    उत्तर देंहटाएं