ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

ह्रदय हँसता भी है,ह्रदय रोता भी है



मुझे बगीचे में जाना
अच्छा भी लगता है
अच्छा नहीं भी लगता है
ह्रदय हँसता भी है
ह्रदय रोता भी है
कुछ फूल खिले हुए
कुछ मुरझाये मिलते हैं
मेरे आस पास के
लोगों के जीवन का
आभास होता है
कुछ के पास
आवश्यकता से अधिक
कुछ के पास
आवश्यकता से भी कम
भाग्य के
इस विचित्र न्याय की
याद दिलाता है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
969-86-19-12-2012
भाग्य, जीवन

5 टिप्‍पणियां:

  1. समाज में व्याप्त वैषम्य को उपवन के बिम्ब के माध्यम से बड़ी कुशलता से उकेरा है ! बहुर सुन्दर रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  2. कविता के भाव एवं शब्द का समावेश बहुत ही प्रशंसनीय है

    हर शब्द शब्द की अपनी अपनी पहचान बहुत खूब

    बहुत खूब

    मेरी नई रचना

    खुशबू

    प्रेमविरह

    उत्तर देंहटाएं
  3. आप की ये खूबसूरत रचना शुकरवार यानी 22 फरवरी की नई पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...
    आप भी इस हलचल में आकर इस की शोभा पढ़ाएं।
    भूलना मत

    htp://www.nayi-purani-halchal.blogspot.com
    इस संदर्भ में आप के सुझावों का स्वागत है।

    सूचनार्थ।

    उत्तर देंहटाएं