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रविवार, 17 फ़रवरी 2013

सब कुछ समझ कर भी नासमझ बनता रहा



सब कुछ समझ कर भी
नासमझ बनता रहा
सच को झूठ
झूठ को सच कहता रहा
रिश्तों को निभाने के खातिर
दुश्मनों को दोस्त कहता रहा
काले चेहरों को
पहचान कर भी सफेद
कहता रहा
खुद को ही धोखा देता रहा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
965-83-15-12-2012
रिश्ते,ज़िन्दगी ,दुश्मन,दोस्त,समझ,नासमझ,

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह!
    आपकी यह प्रविष्टि दिनांक 18-02-2013 को चर्चामंच-1159 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. सब कुछ समझ कर भी नासमझ बनता रहा
    सच को झूठ झूठ को सच कहता रहा
    बहुत खूब उत्कर्ष रचना
    मेरी नई रचना
    फरियाद
    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ
    दिनेश पारीक

    उत्तर देंहटाएं