ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

अब थक गया हूँ



अब थक गया हूँ
इमानदारी सच्चाई,
इंसानियत ढूंढते ढूंढते
ह्रदय अतृप्त
मन व्यथित होने लगा
क्यों नहीं समझ पाता हूँ
दे दी लोगों ने जान
जिसको पाने के लिए
जो मिला नहीं
सदियों से किसी को
मुझे कैसे मिल जाएगा
खुद से पूछता हूँ
क्या तलाश बंद कर दूं
खुद ही उत्तर देता हूँ
लोग सपने भी तो देखते हैं
कुछ पूरे होते
कुछ अधूरे रह जाते
जीना तो नहीं छोड़ते
क्यों ना सपना समझ
तलाश जारी रखूँ
मिल जायेगी तो खुश
हो लूंगा
नहीं मिलेगी तो अधूरा
सपना समझ भूल जाऊंगा
हँसते हुए जीना नहीं
छोडूंगा
963-81-15-12-2012
इंसानियत,अतृप्त,सपना,तलाश,

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (16-02-2013) के चर्चा मंच-1157 (बिना किसी को ख़बर किये) पर भी होगी!
    --
    कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि चर्चा में स्थान पाने वाले ब्लॉगर्स को मैं सूचना क्यों भेजता हूँ कि उनकी प्रविष्टि की चर्चा चर्चा मंच पर है। लेकिन तभी अन्तर्मन से आवाज आती है कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही कर रहा हूँ। क्योंकि इसका एक कारण तो यह है कि इससे लिंक सत्यापित हो जाते हैं और दूसरा कारण यह है कि किसी पत्रिका या साइट पर यदि किसी का लिंक लिया जाता है उसको सूचित करना व्यवस्थापक का कर्तव्य होता है।
    सादर...!
    बसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ!
    सूचनार्थ!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं