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शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

हम तारीफ़ करते रहे,वो सर पर चढाते रहे

हम तारीफ़ करते रहे
वो सिर पर चढाते रहे
खुद को तारीफ़ का
हक़दार समझने लगे
जुबान में तल्खी
अंदाज में गरूर आ गया
जब समझाने के खातिर
आइना दिखाया
उन्हें रास नहीं आया
हमें दुश्मन करार दे दिया
क्यों नहीं समझते ?
हमने तो
बेहतर करने के लिए
सिर्फ उनका होंसला

बढाया था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
926-44-12-12-2012
शायरी,गरूर,

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लेखनी ...जितनी तारीफ की जाए कम है

    काश कर कोई आप जैसा सोच सकता और समझ सकता

    उत्तर देंहटाएं