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शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

माँ पर कविता-माँ तुम माँ हो

माँ तुम महक हो
उस पुष्प की
जिसे रिश्ता कहते हैं
तुम पुष्प हो उस पौधे की
जिसे परिवार कहते हैं
तुम छाया हो
उस वट वृक्ष की
जिसके नीचे
परिवार पलता है
तुम डोर हो त्याग की
जो परिवार को
बाँध कर रखता है
तुम प्रतीक हो
कर्तव्य और निष्ठा की
जो जीना सिखाती है
तुम ज्योति हो
उस दीपक की
जो कर्म पथ से
भटकने नहीं देती
तुम प्रतिमूर्ती हो
सहनशीलता की
जो खुद सहती है
पर सहने नहीं देती
तुम पराकाष्ठा हो
स्नेह की
तुम्हारे ध्यान भर से ही
सुखद अनुभूती होती
माँ तुम माँ हो
इंसान के
हर रूप से श्रेष्ठ हो
तुम्हारी बराबरी
कभी हो नहीं सकती

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
881-65-29-11-2012

1 टिप्पणी:

  1. माँ हर हाल में माँ ही है ...सबसे अलग सबसे निराली :)

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