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शनिवार, 5 जनवरी 2013

ये मौसम भी कितना अजीब होता है



ये मौसम भी कितना
अजीब होता है
कुछ दिनों में चेहरा
बदलता है
कभी गर्मी झुलसाती
कभी सर्दी ठिठुराती
कहीं वर्षा खुशहाली लाती
तो कहीं कहर ढाती
बसंत मन को खुश
करता है
क्या मौसम भी
जीवन के रंग दिखाता ?
कभी रुलाता कभी हंसाता
हर स्थिति के लिए
तैयार रहना सिखाता
ये मौसम भी कितना
अजीब होता है
कुछ दिनों में चेहरा
बदलता है
882-01-01-12-2012
मौसम , जीवन

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

माँ पर कविता-माँ तुम माँ हो

माँ तुम महक हो
उस पुष्प की
जिसे रिश्ता कहते हैं
तुम पुष्प हो उस पौधे की
जिसे परिवार कहते हैं
तुम छाया हो
उस वट वृक्ष की
जिसके नीचे
परिवार पलता है
तुम डोर हो त्याग की
जो परिवार को
बाँध कर रखता है
तुम प्रतीक हो
कर्तव्य और निष्ठा की
जो जीना सिखाती है
तुम ज्योति हो
उस दीपक की
जो कर्म पथ से
भटकने नहीं देती
तुम प्रतिमूर्ती हो
सहनशीलता की
जो खुद सहती है
पर सहने नहीं देती
तुम पराकाष्ठा हो
स्नेह की
तुम्हारे ध्यान भर से ही
सुखद अनुभूती होती
माँ तुम माँ हो
इंसान के
हर रूप से श्रेष्ठ हो
तुम्हारी बराबरी
कभी हो नहीं सकती

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
881-65-29-11-2012

पीड़ित मन



पीड़ित मन से
रोते रोते अचानक
ख्याल आ गया
रोने से किसी को नहीं मिला
तो मुझे कैसे मिलेगा
मन की व्यथा कम करनी है
तो क्यों ना
किसी अपने से बात कर लूं
जो मन को पसंद हो
वो काम कर लूं
अच्छा संगीत सुन लूं
अच्छी किताब पढ़ लूं
मन को हल्का कर लूं
अपने को व्यवस्थित कर लूं
फिर से काम में जुट जाऊं
फिर कभी व्यथित ना होऊँ
ऐसा सोच रख लूं
जो होना है वो हो कर रहेगा
रोने से किसी को नहीं मिला
तो फिर मुझे कैसे मिलेगा
880-64-28-11-2012
व्यथा,व्यथित,मन,पीड़ा,जीवन

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

अँधेरे से आये थे,अँधेरे में जाना है



अँधेरे से आये थे
अँधेरे में जाना है
उजाले के
कुछ पल मिले हैं
उन्हें नहीं खोना है
न रोना है
न रुलाना है
जीवन को मुखर
बनाना है
इश्वर को याद
रखना है
रोते हुए आये थे
हँसते हुए जाना है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
879-63-28-11-2012
जीवन ,मृत्यु

पवित्र प्रेम



पवित्र प्रेम
ईश्वरीय देन
नव जन्मे
बच्चे के ह्रदय सा
मक्खी के ताजे शहद सा
पत्तों पर ओस सा
पहाड़ों पर बर्फ सा
पवित्रता अमर
सुगंध अमिट होती है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
878-62-28-11-2012
 प्रेम,पवित्र प्रेम

झूठी तारीफ़ से बचने लगोगे



तुमने
मेरी पीठ थपथपाई
बदले में मैंने तुम्हारी
पीठ नहीं थपथपाई
तुम्हारी आशाओं पर
तुषारापात हो गया
तुम रुष्ट हो गए
पहले मुझे सोना समझते थे
अब कोयला कहने लगे
अब तुम्ही बताओ
कैसे कोयले को सोना कहूं
कह भी दूंगा
तो तुम्हें झूठे दंभ से
भर दूंगा
तुम सोना बनने की जगह
कोयला ही बने रहोगे
आज मुझसे नाखुश
हो भी जाओ
तो भी तुम्हारा अहित
नहीं कर सकता
पर एक दिन मेरी बात को
समझ जाओगे
खुद झूठी तारीफ़ से
बचने लगोगे
877-61-28-11-2012
झूठी तारीफ़,तारीफ़, नाखुश

हार का ठीकरा



हार का ठीकरा
दूसरों पर फोड़ते हो 
जीत का सेहरा 
खुद के सर बांधते हो 
क्यों सच से
दूर भागते हो 
खुद को धोखा देते हो 
जीतना ही चाहते हो तो
तो पहले
अपने झूठ को जीत लो
सच कहना सीख लो
नहीं तो ज़िन्दगी भर
हार का ठीकरा दूसरों के
सर पर फोड़ते रहोगे 
ज़िन्दगी भर हारते रहोगे 
निराशा में जीते रहोगे 
रोते रोते संसार से
चले जाओगे 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
876-60-28-11-2012
हार,जीत,निराशा,जीवन

बुधवार, 2 जनवरी 2013

बात ही करते रहोगे



प्यार मोहब्बत की
बात ही करते रहोगे
या कभी प्यार भी करोगे
ईमान भाईचारे के बारे में
लिखते ही रहोगे
या कभी जीवन में भी
उतारोगे
दिल में दर्द लेकर भी
मुस्काराते रहोगे
या कभी हकीकत में
मुस्काराओगे
अब चेहरे से
मुखोटा उतार दो
जैसे हो 
दुनिया को बता दो
तुम्हें तुम्हारा
सत्य पता चल जाएगा
जीने की सही राह
दिखाएगा
जीवन तो सुधर जाएगा
अंत भी सुखद हो जाएगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
875-59-28-11-2012
जीवन,प्यार,मोहब्बत,भाईचारा,मुखोटा,

कहीं कोई कली मुस्काये



कहीं कोई कली मुस्काये
फूल बन जग को महकाए
कोई ह्रदय हिलोरें ले
मन खुशी से नाचे गाये
कोई  दुःख में आसूं बहाए
रातों को सो ना पाए
भगवन 
ये कैसी 
रीत बनायी तुमने 
कोई रोता रहे
कोई हँसता रहे
कोई जीना चाहे
कोई मरने की दुआ करे
पल पल जीना भारी हो जाए
सुन लो पुकार मेरी
देना है तो इकसार दे दो 
सुख दुःख बराबर दे दो 
किसी को कम किसी को
अधिक ना रोने दो

डा.राजेंद्र,तेला,निरंतर
874-58-28-11-2012
सुख,दुःख,जीवन

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

अगर चाहूँ रात सवेरे ही आ जाए



अगर चाहूँ
रात सवेरे ही आ जाए
सवेरा रात को हो जाए
चाँद सूरज  सा
सूरज चाँद सा चमकने लगे
मनुष्य घोंसलों में
पक्षी घरों में रहने लगे
तुम कहोगे संभव नहीं
फिर सदकर्म बिना
मन में इर्ष्या,द्वेष,रख कर
चरित्रहीन बन कर
कुत्सित विचार रख कर
इश्वर कैसे मिलेगा
चाहे मंदिर जाओ
मस्जिद जाओ
रामायण पाठ करो 
क़ुरान पढो
काशी जाओ 
काबा जाओ
न इश्वर मिलेगा
न अल्ला मिलेगा
स्वर्ग की चाह में
नर्क अवश्य मिलेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
873-57-28-11-2012
इश्वर,सद्कर्म,इर्ष्या,द्वेष,जीवन

माँ सदा मेरे साथ रहना




माँ
सदा मेरे साथ रहना
मेरे जीवन को
सुखद बनाते रहना
कभी मुझे
अकेला मत छोड़ना
गिर जाऊं तो गोद में
उठा लेना
पथ से भटक ना जाऊं
मुझे रास्ता बताते रहना
दुखों में
दिलासा देते रहना
हिम्मत
हौंसला बनाए रखना
मुझे दया
धर्म सिखाते रहना
सद्कर्म का
पाठ पढ़ाना

माँ तुमने ही जन्म दिया
तुमने ही जीना सिखाया
ध्र्ष्टता हो जाए तो डांट
लगाना 
त्रुटियों को क्षमा करना
माँ तुम ही पालनहार
तुम ही मेरी जीवन आधार
यूँ ही प्यार बरसाते जाना
मुझे आशीर्वाद देते रहना
मेरे जीवन को सफल
बनाना
माँ तुम्हारी खुशी में
मेरी खुशी
तुम्हारी आशाओं पर
खरा उतरना कर्तव्य मेरा
मुझे कर्तव्य पथ से

भटकने न देना
872-56-28-11-2012
माँ

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

दुनिया से जाने के बाद भी



दुनिया से 
जाने के बाद भी 
मेरे चाहने 
न चाहने वालों से 
मिलूंगा ज़रूर
चाहे ख़्वाबों में मिलूँ 
ख्यालों में आऊँ 
जो भी कहता हूँ 
जो भी लिखता हूँ 
याद दिलाऊंगा ज़रूर 
भले ही बुझ जाए 
मेरी ज़िन्दगी के 
चिराग की रोशनी 
पर मेरे ख्यालों की 
रोशनी ज़हन में 
ज़लाऊंगा ज़रूर 
मेरे ख्याल ही कहते हैं 
मुझसे 
आज मेरी बात मानों 
न मानों 
चाहे आज पढो ना पढो 
पर बात कहूंगा ज़रूर 
चाहे मेरे जाने के बाद 
ही सही 
एक दिन सोचने पर 
मजबूर करूंगा ज़रूर

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
871-55-28-11-2012
विचार,ख्याल, सोच

क्या होता है सत्य ,किसी कहते हैं ईमान



आज तक
समझ नहीं सका
क्या होता है सत्य
किसी कहते हैं ईमान
कैसा होता है इश्वर
कैसी होती है आस्था
बहुत पूछा बहुत खोजा
एक ही
उत्तर मिला मुझको
सब के अपने मायने
सब के अपने पैमाने
जैसा सिखाया समझाया
उनके बड़ों ने उनको
जो पढ़ा ग्रंथों में उन्होंने
वही बन गए
पैमाने मायने उनके
जो एक के लिए ठीक
वही दूसरे के लिए गलत
कहलाने लगे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
870-54-28-11-2012
सत्य,ईमान,आस्था,इश्वर,

रविवार, 30 दिसंबर 2012

आराम से सोये तो तीन आ जाएँ ,कसमसाकर सोना हो तो चार



आजादी से आज तक 
===========
आराम से सोये
तो तीन आ जाएँ
कसमसाकर सोना हो तो चार
ठूंस ठांस कर सोना हो तो पांच
पर गरीब की झोंपड़ी थी
आजादी से आज तक
उतनी ही है
चार पांच हाड मांस के पुतले
उसमें ज़िंदा रहते
कोई रात भर खांसता,
कोई जुखाम में नाक
सुड़कता रहता
बाकी बचे लोग ना रुकने वाली
आवाजों के कारण जागते रहते
सवेरे अधसोए अधजगे उठते
पेट भरने के लिए
काम पर निकल पड़ते
रात को थक चूर कर
पहले से अधिक कमज़ोर लौटते
इसी झोंपड़ी में एक से दो हुए
फिर दो से तीन,चार,पांच हुए
कुछ साल में
कभी एक कम हो जाता
तो कभी एक नया जुड़ जाता
झोंपड़ी में
आजादी के बाद बिजली का
एक मरियल सा लट्टू
अवश्य लटक गया
जिसने रात के अँधेरे को तो
कम कर दिया
पर ज़िन्दगी के अँधेरे को
कम ना कर सका
ज़िन्दगी आजादी के पहले भी
लडखडाती थी
लूले लंगड़े प्रजातंत्र में
आज भी लडखडा रही है
देश में और कुछ
बदला ना बदला हो
गरीब की झोंपड़ी नहीं बदली
ऐतहासिक धरोहर सी
अब भी आजादी से पहले की
याद दिलाती है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
869-53-28-11-2012
व्यंग्य,आज़ादी ,आजादी,देश,गरीबी,भुखमरी,प्रजातंत्र