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शनिवार, 15 दिसंबर 2012

मेरी तमन्ना है कोई तमन्ना ही नहीं रखूँ



मेरी तमन्ना है
कोई तमन्ना ही नहीं रखूँ
ये पूरी हो जाए
तो नयी तमन्ना क्यों रखूँ
तमन्ना का क्या
रोज़ उठती रोज़ मरती है
एक पूरी हो जायेगी
तो दूसरी सर उठायेगी
सुकून से जीना है
तो लगाम कसनी पड़ेगी
उठने से पहले हमेशा के लिए
दबानी पड़ेगी
839-23-11-11-2012
शायरी,तमन्ना

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

तुम जुदा हुए तो क्या हुआ



तुम जुदा हुए तो
क्या हुआ
मुझे फर्क नहीं पडा
नुकसान तुम्हारा ही हुआ
एक प्यार भरा दिल
तुम्हारे चंगुल से
मुक्त हो गया
मैं तो पहले भी खुश था
अब भी खुश हूँ
तुम्हारी फितरत का तो
पता चल गया
ज़िन्दगी भर भुगतने से
तो बच गया
838-22-11-11-2012
जुदाई,मोहब्बत,प्रेम ,प्यार,शायरी

या खुदा क्यूं इतना ज़ुल्म ढाते हो



या खुदा
क्यूं इतना ज़ुल्म ढाते हो
तन्हाइयों में भी
तनहा नहीं रहने देते हो
टूटे हुए दिल को तोड़ते हो
ख्यालों में
ज़लज़ला मचाते हो
यादों को
ज़हन से ना जाने देते हो
गर इतना यकीन
तुम्हें अपने वजूद पर
तो मिला दो उससे
नहीं तो यादों से उसका
नाम-ओ-निशाँ ही मिटा दो
मुझे तन्हाई में तो
सुकून पाने दो
837-21-11-11-2012
यादें,तनहा,तन्हाइयां, सुकून

दूर कहीं



दूर कहीं
एक टिमटिमाती सी
रोशनी नज़र आती है
मन में आशाओं का
संचार करती है
जीवन से अन्धेरा
मिटायेगी
चेहरे पर खुशी
होठों पर मुस्कान लायेगी
मुझे निराशा से मुक्ती
दिलायेगी
आशाओं का पुलिंदा लेकर
रोशनी की तरफ
बढ़ जाता हूँ
करीब पहुंचता हूँ
तो पाता हूँ
एक अबला मृत प्राय
पती के पास फूस की
झोंपड़ी में बैठी
सहायता की प्रतीक्षा में
आसूं बहा रही है
उसे दिलासा देता हूँ
उसकी सेवा में जुट
जाता हूँ
836-20-11-11-2012
आशा,आशाएं,जीवन, निराशा

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

बहुत देख लिया



बहुत देख लिया
अपनों का खार
मुस्कराकर किये
उन्होंने
पीठ पीछे से वार
बहुत देख लिया
दोस्तों से
दोस्ती का सिला
हँसते हँसते
उन्होंने धोखा दिया
बहुत देख लिया
मोहब्बत पर
बेवफायी का राज़
वफ़ा के बाद भी
सहना पडा
बेवफायी का इलज़ाम
बहुत देख लिया
उम्र में छोटों से
ज़िल्लत भरा सलूक
अब डर नहीं लगता
अब बेफिक्र जीता हूँ
जिन बातों का डर था
सब देख देख चुका हूँ
सब सह चुका हूँ
835-19-11-11-2012
धोखा,फरेब,छलावा,ज़िन्दगी,जीवन

एक बार फिर सिखा गए



जब तक दोनों आँखें
खुली रखी
मीठी बातों की
परवाह ना करी
ना उम्र ना सूरत ने
लुभाया हमें
परायों से तो बच गए
मगर जब निश्चिंत हुए
अपनों के लिए नियम
तोड़ दिए
तुरंत जाल में फंस गए
हमें फिर भी गम नहीं
अपनों से ही तो छले गए
उन्होंने ही सिखाया था
पहले भी हमें
कैसे फरेबी दुनिया से बचें
एक बार फिर सिखा गए
हँसते हँसते फरेब का
नया रूप दिखा गए
834-18-06-11-2012
धोखा,फरेब,छलावा,ज़िन्दगी,जीवन

या रब मिटानी है तो मिटा दे हस्ती मेरी

या रब 
मिटानी है तो
मिटा दे हस्ती मेरी
यूँ हर लम्हा
इम्तहान तो ना ले
ना ओढ़ाना कफ़न
ना उठाने देना
जनाजा किसी को
चुपके से उठा कर
 ले जाना मुझको
ना बहे
किसी आँख से पानी
ना दिखे
सूरत किसी को
नाम-ओ-निशाँ ही
जहन से मिट जाए
ना तडपे दुनिया में कोई
जैसे मैं तड़पता रहा हूँ
बस इतनी सी ख्वाहिश
पूरी कर देना
जो मुझे नहीं मिला
वो दुनिया को दे देना
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
833-17-06-11-2012
शायरी,नज़्म,ज़िन्दगी,हस्ती ,तड़पना,ख्वाहिश

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

कभी कभी इतना कमज़ोर कैसे हो जाता हूँ


कभी कभी 
कमज़ोर हो जाता हूँ
सच को झूठ
झूठ को सच मान
बैठता हूँ
पथ से भटक जाता हूँ
दुखों से घबरा कर
ह्रदय में डर बिठा लेता हूँ
संतुलन खो बैठता हूँ
शांत मन से सोचता हूँ
क्या स्वयं से
विश्वास खो बैठा हूँ
आत्ममंथन करता हूँ
नतीजे पर पहुंचता हूँ
पथ पर बने रहने के लिए 
धीरज रखना होगा
सहनशील बनना होगा
हिम्मत से लड़ना होगा
मुस्करा कर जीना है तो 
ईश्वर पर आस्था 
स्वयं पर विश्वास 
रखना होगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
आस्था,आत्म मंथन, जीवन  
832-16-06-11-2012
जीवन,सहनशील,धीरज,संतुलन,विश्वास,आत्ममंथन,हिम्मत

सांझ ढलने लगी है




सांझ ढलने लगी  है
चेहरे पर
उदासी छाने लगी  है
रात आने वाली है
विरह की
अग्नि जलने वाली है
उसकी याद आज फिर
सताने वाली है 

हर दिन की तरह 
आँखों की 
नींद उड़ने वाली है
ह्रदय की प्यास
अतृप्त रहने वाली है
ह्रदय की तड़प
मन की
पीड़ा बढ़ने वाली है
वह नहीं आयेगी
जब तक
हर दिन हर रात
वही कहानी दोहराई
जाने वाली है
चैन की बली चढ़ने
वाली है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
831-15-06-11-2012
प्यार,विरह,मोहब्बत,प्रेम

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

कभी पूनम तो कभी अमावस



कभी पूनम तो
कभी अमावस
कभी भरपूर उजाला
कभी घनघोर अँधेरा
क्यों ऐसा होता है
लगता है चाँद ने भी
जीवन से ही सीखा है
क्यों नहीं अन्धेरा उजाला
दोनों कम हो जाए
जीवन सदा इकसार
चमकता रहे
ना अमावस हो
ना कभी पूनम हो
ना रोना पड़े
ना हँसना पड़े
बस मुस्काराहट से
काम चलता रहे
इंसान चिंतामुक्त
जीवन जीता रहे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
831-15-06-11-2012
जीवन,चिंता,चिंताएं

बिनी किसी दुर्भावना के



दुर्भावना बिना
एक मित्र से मज़ाक किया
उसे मज़ाक शालीनता की
सीमाओं के बाहर लगा
उसने तुरंत उल्हाना दिया
मेरे सोच को
घटिया सोच करार दे दिया
उसे मेरा असली सोच
कह दिया
मैंने उस से क्षमा मांग ली
दिल दुखाने के लिए
खेद प्रकट किया
भविष्य में सचेत रहने का
आश्वासन दिया
पर मित्र ने मुझे क्षमा
नहीं किया
मैंने भी विचारों का
गहराई से मंथन किया
पर अच्छे सोच का
अर्थ नहीं समझ पाया
830-14-06-11-2012
जीवन,सोच,मज़ाक,

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

उड़ता जो भी परिंदा आसमान में

उड़ता जो भी
परिंदा आसमान में
एक दिन ज़मीन पर
आता ज़रूर
क्यूं भूल जाता है
इंसान मगर
छूता ऊँचाइयाँ जब
दिमाग को भी अहम की
ऊंचाइयों पर रख देता
देखता नहीं ज़मीन से
जुड़े लोगों को कभी
भूल जाता अपनों को भी
गले उन्ही को लगाता
जो उनकी
हर बात पर मुस्कराता
झूठी तारीफ़ करता
भ्रम की
दुनिया में खो जाता
भूल जाता
रहता नहीं समय
किसी का इकसार कभी
इतना भी याद नहीं रखता
जब भी आयेगा ज़मीन पर
मिलेगा नहीं कोई बात
करने वाला भी कभी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
829-13-06-11-2012

तुम्हें पा ना सका



तुम्हें पा ना सका
ज़िन्दगी संवार ना सका
तन्हाई को दोस्त
सुकून को
दुश्मन बना लिया
समंदर की उम्मीद में
चुल्लू भर
पानी भी नहीं मिला
चेहरा मायूस हो गया
होंसला टूट गया
तुमने बेरुखी से कह दिया
हमने कभी मोहब्बत का
इरादा ही नहीं किया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
828-12-06-11-2012
सुकून,ज़िन्दगी,तन्हाई, मोहब्बत,शायरी,

रविवार, 9 दिसंबर 2012

दिल ना जाने कितनी बार टूटा है



दिल ना जाने
कितनी बार टूटा है
तुम हमसे मोहब्बत का
मतलब पूछ रहे हो
हसरतों की उम्मीद में
रोता रहा है
तुम हमसे मंजिल का
पता पूछ रहे हो
आइना भी अब हमें
पहचानता नहीं
तुम हमारे घर का पता
पूछ रहे हो
तन्हाई अब हमारा घर
कब्रिस्तान हमारी मंजिल
तुम हमसे जीने का
मकसद पूछ रहे हो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
827-11-06-11-2012
दिल,मोहब्बत,

किसने देखा है ब्रह्माण्ड-किसने देखा है सोच का संसार



किसने देखा ब्रह्माण्ड
किसने देखा सोच का संसार
किसने जाना मन का विस्तार
कोई सीमा नहीं कोई अंत नहीं
सब व्यर्थ में
उल्कापिंडों से घूमते रहते हैं
इच्छाओं की दुनिया
गोते लगाते हैं
आधारहीन तथ्यों से
खुद को संतुष्ट करना चाहते हैं
एक दिन उल्कापिंडों 
जैसे ही लुप्त हो जायेंगे
क्यों नहीं जिसने भेजा है
संसार में
उस पर ही सब छोड़ दो
उसकी इच्छा अनुरूप
जीवन जी लें 
जो होना है हो जाएगा
ना कोई रोक सका होनी को
ना ही कोई रोक पायेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
826-10-06-11-2012
मन ,सोच,इच्छा ,जीवन,उल्कापिंड,ब्रह्माण्ड