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शनिवार, 8 दिसंबर 2012

थक गया हूँ तेरा मेरा सुनते सुनते



थक गया हूँ
तेरा मेरा सुनते सुनते
थक गया हूँ
स्वार्थ का पेट भरते भरते
मन भर गया
रिश्तों को तोड़ते तोड़ते
उकता गया हूँ
चेहरा बदलते बदलते
अब सोचता हूँ
क्या जैसा हूँ वैसा बन कर
नहीं रह सकता
झूठ का चोला उतार कर
नहीं फैंक सकता
टूटे रिश्तों को फिर से
जोड़ नहीं सकता
आत्म मंथन करता हूँ
खुद के प्रश्न का उत्तर
खुद ही देता हूँ
केवल इंसान बन कर जी लो
सारी कुंठाओं से मुक्त हो
जाओगे
खुशी से जियोगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
825-09-06-11-2012
सच,झूठ,स्वार्थ,आत्म मंथन,कुंठा,रिश्ते,

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

शक और नफरत को दिल और ज़हन से निकाल दे



दिल इस हद तक
शक और नफरत से
भर गया
आधी बात सुन कर ही
मतलब निकालने लगा
जिसका वजूद ही नहीं
उसकी मूरत बनाने लगा
तुम किसी से हंस कर
बात कर रहे थे
बार बार मेरी तरफ 
देख रहे थे
मैंने समझा तुम मेरी ही
बात कर रहे हो
आग बबूला हो कर
गंदे लफ़्ज़ों से तुम्हारा
इस्तकबाल किया
बाद में पता चला
तुम किसी और बात पर
हंस रहे थे
अब सोचता हूँ खामखाँ
जुबां को गंदा किया
दिमागी दिवालियापन का
सबूत दिया
अब खुदा से दुआ करता हूँ
लाइलाज हो जाए
 उससे पहले
इस बीमारी का
 इलाज़ कर दे
गिरे हुए ख्यालों को
अब और ना गिरने दे
मुझे इंसानियत की राह से
मत भटकने दे
शक और नफरत को
 दिल और ज़हन से 
निकाल दे
824-08-06-11-2012
शक.नफरत,इंसानियत

अहम् के विस्तार में रिश्ते कहीं खो गए



अहम् के
विस्तार में
रिश्ते कहीं खो गए
हम और हमारे
नेपथ्य में रह गए
मैं और मेरा 
अब सब कुछ हो गए
इंसान के नाम पर 
हाड मास के
पुतले रह गए
साथ के नाम पर
अकेले जीने को
मज़बूर हो गए 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
825-09-06-11-2012
अहम्,अहंकार,संतुष्टी,अकेलापन ,रिश्ते

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

इंसान बन कर जीना सिखा दे


हर आदमी
आसमान छूना चाहता
मीनारों से भी
बड़ा बनना चाहता
नीव का पत्थर 

कोई नहीं बनना चाहता
धरती पर रह कर भी
इंसान बन कर 

जीना नहीं चाहता
स्वर्ग की तलाश में
बिना त्याग तपस्या
खुद को 

पुजवाना चाहता
गुलाब की सुगंध चाहता
खुद दुर्गन्ध फैलाता
वृक्ष की 

छाया लेना चाहता
देने में कंजूसी करता
परमात्मा कुछ दे ना दे
इंसान को सद्बुद्धि दे दे
ह्रदय को 
महक से 
भर दे
इंसान बन कर
जीना सिखा दे

डा.राजेन्द्र तेला,निरंतर

824-08-06-11-2012
अहम्,अहंकार,इच्छाएं,जीवन,संतुष्टी,परमात्मा

काव्यात्मक लघु कथा -अब भी कुछ युवा संस्कारों में जीते हैं


काव्यात्मक लघु कथा -अब भी कुछ युवा संस्कारों में जीते हैं
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बूढ़े बाबा ने 
दरवाजा खोला
मुझे देखते ही 
बाबा के मुंह से निकला 
बेटा तो घर पर नहीं है
किससे मिलना है
मैं बोला बाबा आपसे
बाबा चौंक कर कहने लगे
बेटा सांस लेना पेट
भरना भी 
दूसरों पर निर्भर है
तो मुझसे मिलने कोई
क्यों आयेगा
किसी को मुझसे कोई 
काम नहीं
फिर मेरी परवाह
क्यों करेगा
वैसे भी आजकल
बिना काम कोई किसी से
मिलना नहीं चाहता
बिना काम मिलना
समय व्यर्थ करने 
जैसा लगता है 
तुम अपवाद लगते हो
ज़माने की
चाल नहीं चलते हो
मैं बोला
बाबा इस ज़माने में भी
सारे युवा पथ से 
भटके हुए नहीं हैं
अब भी कुछ
युवा संस्कारों में जीते हैं
बच्चे से बूढों तक
सब का ध्यान रखते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
823-07-06-11-2012
बुढापा,युवा,संस्कार,पीढी,  अंतराल जीवन,selected

या खुदा तेरे पैरों की आहट भी नहीं हूँ

या खुदा
तेरे पैरों की
आहट भी नहीं हूँ
तुझे दिल में
बसा कर रखता हूँ
निरंतर
तेरी इबादत करता हूँ
मुझे धन दौलत
नहीं चाहिए
तेरी नज़रें मुझ पर
बनी रहे
तेरा रहम-ओ-करम
बरसता रहे
बस इतनी सी दुआ
करता हूँ


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
822-06-03-11-2012
सदा=आवाज़
खुदा,सदा,इबादत,रहम-ओ-करम,शायरी,selected

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

बचपन तो लौट नहीं सकता



बचपन तो
लौट नहीं सकता
बच्चा बन कर तो
रह सकता हूँ
आज झगडा 
कल दोस्ती तो 
कर सकता हूँ
पुरानी बातें को 
आसानी से
भूल तो सकता हूँ
हर खेल खेल सकता हूँ
उम्र में बड़ों को
भैया,चाचा,ताऊ तो
कह सकता हूँ
कहीं बैठ सकता हूँ
कहीं खा सकता हूँ
बिना धर्म 
जात पांत पूछे
नए दोस्त तो 
बना सकता हूँ
बेफिक्र जीवन तो
जी सकता हूँ
बचपन तो
लौट नहीं सकता
पर बच्चा बन कर तो
रह सकता हूँ


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
821-05-03-11-2012
बचपन,बच्चा,जीवन selected

वो चाँद तो नहीं बन सकते



मन में 
हीन भावना रखे बिना 
चाँद के साथ 
सितारे भी चमकते हैं 
चाँद की चमक से
घबराते नहीं
चांदनी में भी दिखते हैं 
छोटे हुए तो क्या हुआ
अपना वजूद बनाए
रखते हैं
संसार को सन्देश देते हैं 
हर इंसान 
चाँद तो नहीं बन सकता 
पर सितारा बन कर 
चमक अवश्य सकता है  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

820-04-03-11-2012
चाँद,सितारे,चमक,जीवन,सीख,सोच

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

अब क्यों अपने को कमज़ोर साबित करूँ



अपने आप को सम्हालूँ
या यादों में डूबा रहूँ
बची खुची ज़िन्दगी भी
खराब कर लूं
नहीं निभाया अगर
वादा किसी ने
तो क्या ज़िन्दगी भर
रोता रहूँ
निराश हो चुका हूँ
लोगों को बताता रहूँ
हमेशा हार कर भी
जीतता रहा
अब क्यों अपने को
कमज़ोर साबित करूँ
819-03-03-11-2012
ज़िन्दगी,जीवन,निराश,कमज़ोर,याद,यादें

कभी कभी भावों में बह जाता हूँ



कभी कभी
भावों में बह जाता हूँ
मुस्काराहट के साथ कही
हर बात को 
सच मान लेता हूँ
चेहरे पर चढ़ा चेहरा
पहचान नहीं पाता हूँ
चोट खाता हूँ
बौखला कर तय करता हूँ
मुस्काराते चेहरों पर
विश्वास करना छोड़ दूंगा
मीठी बातों के
जाल में नहीं फसूँगा
कुछ दिन निश्चय पर
दृढ रहता हूँ
फिर भावों में बह जाता हूँ
मुस्काराते चेहरों की
बातों में फंस जाता हूँ
मुस्काराहट मेरी कमजोरी
दुनिया को बता देता हूँ


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
818-02-03-11-2012
भाव,मुस्काराहट,मुस्काराते,जीवन

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

इतना खुद गर्ज़ नहीं हूँ



इतना खुद गर्ज़ नहीं हूँ
बस्ती में घर जल रहे हैं
मैं घर को रोशनी से सजाऊँ
लोग मातम मना रहे हैं
मैं खुशी के गीत गाऊँ
इतना बेदिल भी नहीं हूँ
लोगों के दिल
गम में टूट रहे हैं
मैं दिल-ऐ-सुकून के लिए
दर दर भटकता रहूँ
सिर्फ अपने लिए जीता रहूँ
इंसान हूँ इंसान बन कर
जीना चाहता हूँ
 मुझे फ़िक्र नहीं
खुशी मिले या गम
दुनिया के दुःख दर्द में
काम आना चाहता हूँ
हँसते के साथ हंसना
रोते के साथ रोना
चाहता हूँ



© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
817-01-03-11-2012
खुद गर्ज़,दिल-ऐ-सुकून,बेदिल, इंसानियत ,इंसान