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शनिवार, 1 दिसंबर 2012

जब रात आयी



शाम को धकेल कर
जब रात आयी
चिड़ियाओं की चचहाहट
बंद हो गयी,
वातावरण में निस्तब्धता
छा गयी
मन को अच्छा नहीं लगा
तुरंत रात से पूछ लिया
क्यों हर दिन तुम
उजाले को लीलती हो
एक दिन तो 

विश्राम कर लो
चौबीस घंटे 

उजाला ही रहने दो
चिड़ियाओं को जी भर के
चचहाने दो
रात ने मुस्कराकर 

उत्तर दिया
मित्र मैं उजाले को 

भगाती नहीं हूँ
सूर्य को विश्राम करने का
अवसर देती हूँ
वो अगले दिन 

तरोताजा हो कर
पूरे वेग से चमके
आवश्यकता से अधिक
कार्य करेगा तो थक जाएगा
कैसे भरपूर उजाला देगा
धीरे धीरे 

अँधेरे में खो जाएगा
तुम मनुष्यों को भी
विश्राम की आवश्यकता है
नहीं तो तुम भी थक कर
रोग ग्रस्त हो जाओगे
फिर जी ना पाओगे
मैं विचारों में खो गया
नींद की गोद में समा गया
चिड़ियाओं की
चचहाहट ने आँखें खोली
भोर हो चुकी था
रात भी विश्राम के
लिए जा चुकी थी


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
811-53-28-10-2012
विश्राम,जीवन,ज़िन्दगी,आराम ,स्वास्थ्य

दूर रह कर भी


कल रात
कमरे की खिड़की से
चाँद को झांकते
कमरे को
शीतल चांदनी से
नहलाते देखा तो
मन ने प्रश्न किया 
चाँद से पूछों
क्यों केवल चांदनी को 

भेज कर काम चलाता है
क्यों कभी
खुद नहीं आता है
ये कैसा रिश्ता
निभाता है
पूछने से पहले ही
चाँद समझ गया
मन क्या चाहता है
मुस्काराते हुए 

चाँद कहने लगा 
मित्रता का रिश्ता
निभाता हूँ
निरंतर दूर रह कर भी
प्रेम दर्शाता हूँ
चांदनी को नित्य
धरती पर भेजता हूँ
अँधेरे को दूर कर
तुम्हारा 

जीवन सुलभ करता हूँ
रिश्तों को 

निभाने के लिए
नित्य मिलना ही
आवश्यक नहीं होता
दूर रहते हुए भी
रिश्तों को
निभाया जा सकता
संवाद
बनाया जा सकता है
अनेकानेक तरीकों से
मित्र,मित्र की
मदद कर सकता है
शीतल चांदनी की
सुन्दर भेंट के साथ
चाँद सुन्दर सीख भी
दे गया
मन को भाव विव्हल
कर गया



© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

810-52-28-10-2012
चाँद ,चांदनी,रिश्ते,मित्र,मित्रता,selected

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

मन को कैसे देखेंगे



आज कल लोगों को
दिल ही नहीं दिखता
मन को कैसे देखेंगे
जब चिकनी चुपड़ी 
बातों से
मुस्काराते चेहरों से ही
खुश हो जाते हैं
उन्हें सच्चाई
कैसे पसंद आयेगी
कसूरवार वो भी नहीं
ज़माने की
हवा ही कुछ ऐसी है
हर शख्श
उसी फितरत से सांस
ले रहा है
ज़िन्दगी जीने के बजाए
काट रहा है


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
809-51-28-10-2012
ज़िन्दगी,फितरत,,जीवन,सोच,

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

अब किसी काम नहीं आयेगी



कल तक मिट्टी
खोदती थी
पैरों तले गूंधती थी
सुराही,मटके ,खिलोने
बनाती थी
सब को खुश रखती थी
ज़िन्दगी भर
मन में तमन्ना रखी थी
मरने के बाद भी
किसी के काम आयेगी
खुदा के आगे एक ना चली
आज ढेरो मन मिट्टी के
नीचे दबी पडी है
उसके साथ उसकी
तमन्ना भी दबी पडी है
अब किसी काम नहीं
आयेगी
808-50-28-10-2012
जीवन,मृत्यु

पुराने पेड़ों की छाया में

आयु लिए 
शाखाओं पत्तियों से 
भरे हुए 
पुराने पेड़ों की छाया में 
लोग सदा से 
विश्राम करते रहे हैं 
बरसात में भीगने से
आंधी तूफ़ान
तेज़ धूप में 
गर्मी से बचने के लिए
उनकी छाया में बैठते रहे हैं 
नए पेड़ जोशपूर्ण तरीके से 
तेजी से बढ़ते अवश्य हैं
पर नए पेड़ों में
ना घने पत्ते होते हैं
ना ही घनी छाया होती है
चाहते अवश्य हैं
दुनिया को समेट लें
सब को छाया दे दें
पर सफल नहीं हो पाते हैं
समस्या से घिरते हैं 
बड़े पेड़ों से पूछते हैं
कैसे वे अब तक  
अकाल तेज़ गर्मी आंधी  
तूफ़ान से बचते रहे 
बड़े पेड़ 
समस्याओं का हल 
कैसे ढूँढें किस से पूछें 
जान नहीं पाते
बुजुर्गों का भी यही
हाल होता है
मरते दम तक छाया
तो देते हैं
पर मन मुताबिक़
छाया से वंचित रहते हैं 
807-49-28-10-2012
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
बुढापा,अनुभव,जीवन

बुधवार, 28 नवंबर 2012

मिला नहीं जब तक साहिल उन्हें



लबों पर नाम उनका ,
जहन में यादें उनकी
दिल धड़कता उनके लिए
पर उन्हें फ़िक्र नहीं
हमने समझा था
साहिल उन्हें
उन्होंने समझा साहिल तक
पहुचाने की किश्ती का
मांझी हमें
मिला नहीं जब तक
साहिल उन्हें
हँस कर मिलते रहे
हमारे दिल से खेलते रहे
806-48-28-10-2012
यादें,साहिल,मंजिल,बेवफाई ,शायरी,

विकृत सोच से मुक्त हो लूं



खुद को दुश्मनों से
बचाने के लिए
जेब में खंज़र तो रखता हूँ
पर वक़्त आने पर
खंज़र कैसे चलाऊंगा
इस बात से डरता हूँ
क्या किसी ऐसे से पूछूं
जो बेगुनाहों पर खंज़र
चला चुका है
या किसी ऐसे से पूछूं
जो खंज़र चलाना
सीख चुका है
कहीं मुझे ही ना मार दे
पूछते हुए भी डरता हूँ
फिर जेब में खंज़र क्यों
रखता हूँ
सारा ज़माना कहता है
इसलिए मैं भी खंज़र
रखता हूँ
या भ्रम में जीता हूँ
खंज़र रखने से बच जाऊंगा
कभी सोचता हूँ
खंज़र रखने से भी क्या होगा
जब खंज़र चला नहीं सकता
तो फिर क्यों खंज़र रखता हूँ
क्यों ना खंज़र को फैंक दूं
जिसको रखने भर से
हर पल केवल ज़ख्म खाने की
ज़ख्म देने की याद आती है
बिना खंज़र ही जी लूं
खुद को परमात्मा के
रहम-ओ-करम पर छोड़ दूं
विकृत सोच से मुक्त हो लूं



© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
805-47-28-10-2012
विकृत सोच

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

हँसी के कुछ पल


हँसी के कुछ पल
जीवन के
अंतिम समय में
पलंग पर लेटा हुआ वृद्ध
चेहरा मुरझाये फूल सा,
शरीर सूखे हुए वृक्ष सा
पर आँखों की चमक
नव पल्लवित कली सी
जोश उमंग से भरपूर
नम आँखों से बेटे की
प्रतीक्षा कर रहा था
उसे अभी अभी
सुखद समाचार मिला
आज बरसों बाद
खोया हुआ बेटा घर
लौट आया
संसार से जाते जाते
हँसी के कुछ पल
साथ लाया


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
804-46-28-10-2012
हँसी,जीवन ,अंतिम समय,हँसी के कुछ पल