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शनिवार, 24 नवंबर 2012

जब भी अपने कमरे में लौट कर आता हूँ


घंटों बाहर रहने के बाद
जब भी अपने कमरे में
लौट कर आता हूँ
अपनेपन का अहसास होता है
लगता है मेज़ कुर्सी बेचैनी से
मेरा इंतज़ार कर रही हैं
कलम मेरी ऊंगलियों में
खेलने को बेताब दिखती है
बिस्तर खुली बाहों से
आराम करने का बुलावा देता है
महसूस होता है टीवी कह रहा है 
अब उसे मेरा
मनोरंजन करने का मौका मिलेगा
टयूब लाईट रोशनी से कमरे को
जगमगाने के लिए तैयार
बटन दबाने के इंतज़ार में दिखती
मेरा इतना इंतज़ार तो कोई भी नहीं करता
कितनी भी देर के बाद कमरे में आऊँ
कोई शिकवा शिकायत नहीं करता
रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में
मेरे साथ मेरे कमरे के सिवाय
ऐसा कही भी नहीं होता
किसी ना किसी को
कोई ना कोई शिकायत हती है
कभी कोई नाराज़ हो कर
मुंह फुलाता है
कभी सवालों की झड़ी लगाता है
मन करता है 
कमरे से बाहर निकलूँ ही नहीं
पर मजबूरी है नहीं चाहते हुए भी
कुछ घंटे कमरे को खामोशी से
मेरे इंतजार में छोड़ कर जाना पड़ता है
मेरे कमरे से बेहतर
मुझे कोई नहीं समझता
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर



© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
798-40-25-10-2012
कमरा,एकांत

नहीं चाहो तो



नहीं चाहो तो
मत बताओ हाल
अपना
बस इतना सा जान लो
हम भी उतने ही
ग़मज़दा हैं
जितने तुम हो
अब भी यकीन नहीं तो
आइना देख लो
जैसी दिखेगी तुमको
सूरत अपनी
कुछ वैसी ही सूरत
हमारी भी है
797-39-25-10-2012
सूरत, आइना, हाल

घूंघट के पीछे



घूंघट के पीछे
चेहरा छुपा कर
तुमने आज मेरे लिए
अमावस कर दी
लगता है 
तुम भूल गयी
अमावस के बाद
पूनम भी आती है


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
796-38-25-10-2012
अमावस,पूनम ,घूंघट

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

भुला दिया है



आजकल नींद भी
अच्छी आती
मन भी बेचैन नहीं रहता
ना हम
किसी का इंतज़ार करते
ना कोई
हमारा इंतज़ार करता
उन्होंने हमें
हमने उन्हें भुला दिया है
794-36-25-10-2012
भुला दिया

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

शुक्रिया अदा करूंगा



सब को भुला दूंगा
तुझे ना भुला सकूंगा
किसी और ने
ना तड़पाया इतना
जितना तूने तड़पाया
ऐसा कमाल किया तूंने
ज़मीन पर
दोजख दिखाया तूनें
तुझे भूल नहीं सकता
मरते दम तक तेरा
शुक्रिया अदा करूंगा
795-37-25-10-2012
शुक्रिया, भुलाना ,भूलना

कहीं इतना निश्चिंत ना हो जाऊं



कुछ घटनाएं
ऐसी घटती  
बीती घटनाओं की
दिलाती
भूलना चाहूँ तो भी
नियती भूलने नही देती
बार बार याद करने को
मजबूर करती
चाहती उन्हें सहेज कर
सीने से लगाए रखूँ
सचेत रखती हैं
कहीं इतना निश्चिंत
न हो जाऊं
पहले से भी बड़ा धोखा
 न खा जाऊं


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
793-35-25-10-2012
निश्चिंत,धोखा,घटनाएं

ठण्ड का अहसास



जेठ की तेज़ गर्मी से
लहुलुहान दोपहर
लू से घबराकर
हर आदमी घर में
दुबका हुआ
चिड़ियाएँ खोमोशी से
घोंसलों में नींद ले रही
लू और गर्मी से
बिना घबराए
वो उसके इंतजार में
गली के नुक्कड़ पर
खड़े हो कर
रोज़ उसका इंतज़ार
करता
यही तो वो मौक़ा
किसी की नज़रों में आये
बिना वो अकेले में
उससे मिल सकता
तेज़ गर्मी और लू में भी उसे
ठण्ड का अहसास मिलता
792-34-25-10-2012
मोहब्बत,इंतज़ार,मुलाक़ात,अहसास

बुधवार, 21 नवंबर 2012

तूफ़ान बन कर ज़िन्दगी में आये



तूफ़ान बन कर
ज़िन्दगी में आये
बहा कर साथ ले गए
मोहब्बत की फुलझड़ी
दिल में जला गए
दीपावली से पहले
हमारी
दीपावली मना गए
उम्मीदें जगा गए
निरंतर इंतज़ार
सिखा गए
मिलने की चाहत
बढ़ा गए
रोना भुला गए
हंसना सिखा गए
आदत खराब कर गए
ख़्वाबों की दुनिया में
खोना सिखा गए
791-33-25-10-2012
मोहब्बत,दीपावली

मंजिल करीब थी फिर भी बहुत दूर थी



मंजिल करीब थी
फिर भी बहुत दूर थी
ना कदम थके थे
ना हिम्मत हारी थी
वो दिख क्या गयी
कदम अड़ गए
नज़रें हटने का 
नाम नहीं ले रही थी
खबर भी नहीं हुयी
कब सुबह से शाम
हो गयी
मंजिल करीब थी
फिर भी बहुत दूर थी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
790-32-24-10-2012
मंजिल,ख़ूबसूरती,

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

मंजिल की तलाश में



मंजिल की तलाश में
ज़िन्दगी भर
उनके पैगाम का इंतज़ार
करता रहा
जब तक पैगाम आया
मंजिल का
पता बदल चुका था
तन्हाई को
मंजिल मान चुका था
समझ चुका था
इक दिन तो
किसी एक को तनहा
रहना होगा
अकेले में रोना होगा
789-31-24-10-2012
मंजिल,तलाश,ज़िन्दगी ,मोहब्बत,तन्हाई,

मन भर गया तो



मन भर गया तो
उन्होंने सोचा
अब रिश्ता ही तोड़ लें
थक हार कर बैठ
जाऊंगा
वो भूल गए
उन्होंने ही कहा था
मुझसे
मोहब्बत के खातिर
जान भी गवानी पड़े
तो गवां देना
जुदा करने की
कोशिश भी करे कोई
तो हार नहीं मानना
हमारी मोहब्बत को ही
ज़िन्दगी का किनारा
समझना
788-30-24-10-2012
मोहब्बत,जुदाई

सोमवार, 19 नवंबर 2012

हम खुद को बहुत हूनरमंद समझते थे



खुद को बहुत
हूनरमंद समझते थे
रूठे मौसम को
मना लेते थे
खिजा को बहार में
बदल देते थे
जब मामला
दिल का आया 
मात खा गए
उन्हें हर तरीके से
मनाया
पर मना ना पाए 
डा.राजेन्द्र तेला,निरंतर
787-29-24-10-2012
प्यार,प्रेम,हूनरमंद, खिजा,बहार

रविवार, 18 नवंबर 2012

हमने समझा था



ना जुनून काम आया
ना दीवानगी काम आयी
हमने समझा था हमने
उन्हें अपना बना लिया
उन्हें सिर्फ हमारी
दौलत पसंद आयी
हमने दिल दिया था
उन्होंने सौदा मान लिया
हमसे चंद लम्हे 
साथ गुजारने की
कीमत मांग ली
डा.राजेन्द्र तेला,निरंतर
786-28-24-10-2012
दीवानगी, सौदा, दौलत, दिल