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शनिवार, 17 नवंबर 2012

क्या खता इतनी बड़ी थी



क्या खता 
इतनी बड़ी थी
क़त्ल किया नहीं
सजा क़त्ल की दे दी
हमें इल्म नहीं था
शक क़त्ल से भी
बड़ा गुनाह होता
हमने तो छोटी बहन
समझ कर कहा था
हम तुम्हें चाहते हैं
तुमने इज़हार-ऐ-इश्क
समझ लिया
बिना सोचे समझे
गुनाहगार करार दे दिया
रिश्तों से ऐतबार ही
उठा दिया
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
783-26-24-10-2012
गुनाहगार,रिश्तों, गुनाह

हमसे दुश्मनी का मतलब मत पूछो



हमसे दुश्मनी का
मतलब मत पूछो
हमने सिर्फ 
प्यार किया है
प्यार का
मतलब जानते हैं 
दुश्मनी का मतलब
जानना चाहते हो तो
हमारे पुराने 
दोस्तों से पूछ लो

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
782-25-24-10-2012
दोस्ती,दुश्मनी,दोस्त

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

ह्रदय जले तो मन जले



ह्रदय जले तो
मन जले
मन जले तो
कुछ नहीं भाये
जीना मजबूरी
जीवन बोझ बन जाए
व्यवहार असहज
सोच असार्थक
विचार नकारात्मक
हो जाए
कुछ करने की इच्छा
नष्ट हो जाए
मनुष्य पिंजरे में
बंद पंछी सा फडफडाये
ना उड़ सके
ना बैठ सके
व्यथित,निसहाय
जीवन बिताए
781-24-24-10-2012
ह्रदय , मन,व्यथित,निसहाय,जीवन

अब रोज़ की ज़द्दोज़हद से थक गए हैं



अब रोज़ की
ज़द्दोज़हद से
थक गए हैं
 अब कुछ ऐसा
करना चाहते हैं
जो मन को भाये
दिल को सुहाए
किसी का दिल न
दुखाये
हम भी आराम
से जियें
वो भी आराम
से जियें
दोनों खुश रहे
780-23-24-10-2012
ज़द्दोज़हद,दिल को सुहाए,मन को भाये 

ना तुम मुझे ना मैं तुम्हें अपना बना पाऊंगा



न तुम मुझे
न मैं तुम्हें 
अपना बना पाऊंगा
हमारे दरमियान
रिश्तों की मजबूरियां
दीवार बन कर खडी हैं
न तुम गिरा पाओगी
न मैं गिरा पाऊंगा
अगर कोशिश भी करी
मैं ज़ख़्मी हो जाऊंगा
तुम भी
ज़ख़्मी हो जाओगी
भला इसमें ही है
दूरियों को
खुदा की रज़ा समझ
कबूल कर लो
मैं तुम्हारे लिए दुआ करूँ
तुम मेरे लिए दुआ करो
ज़मीं पर मुमकिन नहीं
ज़न्नत में ही मिल लेंगे 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
779-23-23-10-2012
रिश्ते,मजबूरियां,प्रेम

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

क्यों सताते हो



क्यों सताते हो
इतनी नफरत रखते हो
निरंतर हम पर
लांछन लगाते हो
हमारी हर बात को
गलत समझते हो
जो हमने
कभी सोचा भी नहीं
अपने मन से कहते हो
अगर हमसे
इतना परेशान हो
हम संसार से
जाने के लिए तैयार हैं
क्यों हमसे मुक्ती नहीं
पा लेते
क्यों हमारी जान नहीं
ले लेते
हर दिन हमें मारते हो
जीने नहीं देते हो
अब तक समझे नहीं
तुम क्या चाहते हो
या तो हिम्मत करो
हमारा नाम-ओ-निशाँ
ही मिटा दो
या तुम भी चैन से जीओ
हमें भी जीने दो
778-22-23-10-2012
लांछन ,नफरत

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

ह्रदय जल रहा था



ह्रदय जल रहा था
मन प्रेम की भूख से
तड़प रहा था
मिली जब छाया
तुम्हारे ह्रदय में  
ह्रदय की भूख
मन की प्यास मिटी
तन को ताकत
मन को शांती मिली
मांझी को किश्ती
किश्ती को मिला
किनारा
इच्छाएं रुक गयीं
दुआएं पूरी हुयी
मैं तुम्हारा हुआ
तुम मेरी हुयी
777-21-23-10-2012
प्रेम,मन,ह्रदय,शान्ति

ये हवा भी न जाने कितने चेहरे बदलती है



ये हवा भी न जाने
कितने चेहरे बदलती है
कभी आंधी बन कर
कभी तूफ़ान बन कर
तांडव मचाती है
कभी मंद शीतल
मधुर स्वर लहरी सी
कानों में बंसी बजाती है
मन को प्रफुल्लित करती है
कभी गोरियों के आँचल से
कभी बालों से
अठखेलियाँ करती है
आशिक मिजाजी का
सबूत देती है
कभी सांय सांय की ध्वनी से
मरघट की याद दिलाती है
पता नहीं कहाँ से आती है
कहाँ जाती है
ये हवा भी न जाने
कितने चेहरे बदलती है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
776-21-23-10-2012
हवा, चेहरे, अठखेलियाँ

ज़िन्दगी के सफ़र में बनते हैं दोस्त कई



ज़िन्दगी के सफ़र में
बनते हैं दोस्त कई
छोड़ जाते हैं
साथ भी दोस्त कई
रहते हैं आखिर तक
साथ वही
जो 
न देखते नफ़ा
न नुक्सान
दोस्ती में कोई


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
775-20-23-10-2012
ज़िन्दगी,दोस्त,दोस्ती

सोमवार, 12 नवंबर 2012

चाहे नवरात्रि बनाओ ,चाहे दशहरा मनाओ चाहे


नवरात्रि बनाओ
चाहे दशहरा मनाओ
पहले मन के
रावण का नाश करो
माता को
खुश करने से पहले
माता के जैसा
मन तो कर लो
माता
उनकी ही सुनती है
जिनका मन
निश्छल होता है
इतना सा याद रख लो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
774-19-23-10-2012
पूजा,दशहरा ,नवरात्रि,माता,रावण,

हम लीक से हट कर चलते रहे



हम लीक से
हट कर चलते रहे
लोग काफिर समझते रहे
हम प्यार से गले
लगाते रहे
लोग दुश्मन समझ 
पीछा छुडाते रहे
 हम भी आदत से ढीठ थे
नए दोस्त बनाते रहे

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
773-18-16-10-2012
दोस्त

रविवार, 11 नवंबर 2012

जंगल लुट रहा है



जंगल लुट रहा है
हर वृक्ष को सलीके से
काटा जा रहा है
काटने का
नित नया नया बहाना
बनाया जा रहा है
कभी सड़क का
कभी नयी बस्ती का
पक्षी रो रहे हैं
जानवर व्यथित हैं
पर इंसान को
कोई फ़िक्र नहीं
हो भी क्यों
ना वो जानवर है
ना ही वो पक्षी है
सड़क और बस्ती भी
उसी के लिए ही तो
बन रही है
772-17-16-10-2012
पर्यावरण,प्रकृति,जंगल