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शनिवार, 3 नवंबर 2012

छोटा सा काँटा

चलते चलते
ध्यान रखते रखते भी
पैर में चुभ गया
छोटा सा काँटा
चलना रुका नहीं
पर दर्द से हाल बेहाल 
करने लगा
छोटा सा काँटा
पेड़ तले बैठ गया 
प्रयास करने लगा 
किसी तरह निकल जाए
छोटा सा काँटा
पैर लहुलुहान हो गया 
पर निकलने को 
राजी नहीं हुआ 
जिद पर अड़ गया
छोटा सा काँटा 
थक हार कर लंगडाते हुए
फिर सफर पर चल पडा 
समझ गया 
चाहे जितना भी 
ध्यान रख लो
ज़िन्दगी के सफ़र में
चुभ सकता है
छोटा सा काँटा
रुला सकता है
बिगाड़ सकता 
ज़िन्दगी की चाल
करता सकता हैरान
छोटा सा काँटा
कब चुभेगा 
पता नहीं चलता
कर देगा जीना दूभर
छोटा सा काँटा
ज़िन्दगी का सफ़र
आसान नहीं होता 
बता गया
छोटा सा काँटा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

755-51-27-09-2012
ज़िन्दगी,सफ़र,कष्ट,तकलीफ,

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

ज़िन्दगी भर मसर्रतों की तलाश में भटकता रहा



ज़िन्दगी भर
मसर्रतों की तलाश में
भटकता रहा
मसर्रतों तो मिली नहीं
ग़मों से
दोस्ती ज़रूर हो गयी
नफरत भरे
दिलों से मुलाक़ात हुयी
मोहब्बत की बात
करने वाले चेहरों की
हकीकत पता चल गयी
वफ़ा के नाम पर
बेवफाई मिल गयी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मसर्रतों= =खुशियाँ
754-50-23-09-2012
शायरी ,मोहब्बत,नफरत, ज़िन्दगी ,वफ़ा ,बेवफाई, मुसर्रतें ,खुशियाँ

गम इस कदर आदत बन गया



गम अब इस कदर
आदत बन गया
एक दिन भी गुजर जाए
बिना उसके
मन नहीं लगता
शौक़ तो नहीं
ज़बरदस्ती पालूँ गम को
पर शायद
किस्मत में यही लिखा है
खुदा की रजा समझ
हँसते हँसते
गले लगाता हूँ
नहीं मिलता जिस दिन
किसी तरीके से ढूंढ लेता हूँ
इतना ज़ज्ब हो चुका दिल में
बिना गम के अब रहा
नहीं जाता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
753-49-23-09-2012
गम,आदत,दुःख,ज़ज्ब ,ज़िन्दगी

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

जब भी……..



जब भी
बार बार असफलता
हाथ लगती है
निराशा मन में घर
बनाने लगती
मन खिन्नता से भर जाता
समय ठहर जाता
चेहरे पर
अवसाद झलकने लगता
दिन ढलता नहीं
नींद बुलाने से भी आती नहीं
पथ कठिन
लक्ष्य दूर लगने लगता
आकान्शाएं मरने लगती
इरादे धूमिल होने लगते
कदम डगमगाने लगते
कुछ भी अच्छा नहीं लगता
ऐसे में
स्वयं पर विश्वास
इश्वर में आस्था
धीरज और संयम रखना ही
एकमात्र सहारा होता
752-48-23-09-2012
असफलता,खिन्नता,अवसाद,आकान्शाएं
लक्ष्य,इरादे ,आस्था,इश्वर ,विश्वास,संयम ,धीरज

तुम्हारी ज़िन्दगी में,मैं कहाँ पर हूँ



तुम्हारी ज़िन्दगी में
मैं कहाँ पर हूँ
ना पहले कभी पूछा
ना आज पूछ रहा हूँ
मैं तो पहले भी
तुम्हारा दीवाना था
आज भी दीवाना हूँ
बस इतना सा फर्क
आया है
जब तक तुम्हें
कोई और नहीं मिला था
तुम मुस्काराकर
मेरी बातों को सुनती थी
अब मेरी तरफ
देखती तक नहीं हो
मुझे पता नहीं था
तुम वक़्त गुजार रही हो

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
751-47-23-09-2012
ज़िन्दगी,दीवाना ,दीवानापन

बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

जब सूरज पहाड़ों के पीछे से झाँकने लगता है



जब सूरज पहाड़ों के
पीछे से झाँकने लगता है
लगता जैसे
उसका चमकता चेहरा
नज़र आ रहा है
वो भी इतनी दूर मुझसे
जितना आसमान में
सूरज मुझसे
मुझे अपनी ख़ूबसूरती की
रोशनी से
सरोबार तो करती
पर कभी
अपनी ख़ूबसूरती को
करीब से नहीं देखने देती
748-44-23-09-2012
ख़ूबसूरती, चमकता चेहरा

टहलते टहलते



आज टहलते टहलते
पेड़ के नीचे बैठे एक 
परिचित बुजुर्ग 
सज्जन मिल गए
अकेले बैठे रहने का 
कारण पूछा
नम आँखों से कहने लगे 
अकेले रहने के अलावा 
कोई चारा भी नहीं
बुढ़ापे में ना कोई सुनता ,
ना समझता 
कुछ कहने से पहले ही
चुप कर दिया जाता हूँ 
निरंतर
प्रताड़ित होता हूँ 
मेरे लिए किसी के पास
समय नहीं
सब अपने काम में व्यस्त हैं
व्यथित हो कहीं जाने का 
प्रयत्न करता हूँ 
तो थोड़ी दूर चल कर 
थक जाता हूँ 
वैसे भी डूबते सूरज को
कौन नमस्कार करता है
अब बेबसी सहारा है
सुबह दो रोटी लेकर
घर से निकलता हूँ
पेड़ के नीचे दिन 
गुजारता हूँ
आने जाने वालों को 
देख कर
मन लगाता हूँ
कोई पास आ जाता तो
दो बात कर लेता हूँ
इसी तरह दिन गिनता
रहता हूँ

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
747-43-23-09-2012
बुढापा,बूढा,बूढ़े,बुजुर्ग,जीवन
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
E

उनकी बेरुखी के बाद



उनकी बेरुखी के बाद
हमें समझ आया
हम दिन में जुगनू
पकड़ने की कोशिश
कर रहे थे
जिसे जुगनू समझ रहे थे
वो जुगनू नहीं
शहद की मक्खी थी
उन्हें मोहब्बत तो
ज़ज्बातों से खेलने की थी
कोई पास आने की
कोशिश करता तो
काट लेती थी
746-42-23-09-2012
बेरुखी,ज़ज्बात

मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

ग़मों के बोझ तले



ना कहीं खोता हूँ
ना कहीं छुपता हूँ
कभी अपने
ग़मों के बोझ तले
सब कुछ भूल जाता हूँ
कभी दूसरों को
पागल कहता हूँ
कभी खुद पागलपन
करता हूँ
परेशानियों से
घबरा जाता हूँ
भावनाओं पर
नियंत्रण खोता हूँ
मैं भी इंसान हूँ
भूल जाता हूँ
होश आने पर
शर्मिन्दा होता हूँ
माफ़ी माँगता हूँ
अनुभव से
सीख लेने का
पथ से नहीं
भटकने का
निश्चय करता हूँ
745-41-23-09-2012
गम,परेशानियां ,

सोमवार, 29 अक्तूबर 2012

ऋण



लोगों को
गलतियाँ करते देखा
बाद में व्यथित होते
पछताते देखा
तो रहा नहीं गया
सोचा
क्यों ना जीवन का
अनुभव बाँट दूँ
अपने से छोटों को
जीवन का अर्थ समझा दूँ
आने वाले पचड़ों से
बचा दूँ
उनका जीवन सुखद
बना दूँ
मन से आगे बढ़ कर
लोगों को सीख देने का
समझाने का प्रयत्न किया
किसी को मेरा कृत्य
पसंद नहीं आया
उलटा मंतव्य पर
प्रश्न उठाया गया
शक से देखा गया
जानता नहीं
पहचानता नहीं फिर
बिना मांगे ही
क्यों निस्वार्थ मदद
कर रहा हूँ
कई बार खून का घूँट
पीना पडा
अपमान सहना पडा
सोचा बिना मांगे
सलाह देना उचित नहीं
तो क्यों ना आदत छोड़ दूँ
बार बार के अपमान से
मुक्त हो जाऊं
गहन सोच के बाद
निर्णय लिया
मैं ऐसा ही करता रहूँगा
मेरे अनुभव से
किसी एक का भी भला
कर पाया तो
मन को संतुष्टी मिलेगी
अनुभव बांटने के
उद्देश्य को पूरा मानूंगा
जो मैंने
अनुभवी लोगों से सीखा
उनका ऋण कुछ तो
कम कर पाऊंगा
744-40-20-09-2012
ऋण, संतुष्टी, अनुभव,जीवन

एक इच्छा और क्यों बढाऊँ



पानी  से भरे
बादल के टुकड़े ने
आज फिर मुझे लुभाया
मुझे उकसाने लगा
उसे अपने मन के
खेत में बरसा दूं
इच्छाओं की
सूखती फसल फिर से
लहलहाने लगेगी
विचारों ने मोड़ लिया
कहीं अधिक बरस गया तो
कुछ भी हाथ नहीं लगेगा
फसल पूरी तरह गल जायेगी
मन को समझाया
इस बार सावन नहीं बरसा
तो क्या हुआ
अगले बरस अवश्य
बरसेगा
मन को संतुष्ट किया
इश्वर की कृपा रहेगी तो
सब ठीक हो जाएगा
कितनी भी इच्छाएं रखूँ
सब तो
वैसे भी पूरी नहीं होती
एक इच्छा और क्यों बढाऊँ
जो ऊपर वाले ने दिया है 
क्यों ना उसमें ही संतुष्ट रहूँ
कॉपीराइट@

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
743-39-20-09-2012
संतुष्टी,संतुष्ट,इच्छाएं,इच्छा ,जीवन ,आकांशाएं

रविवार, 28 अक्तूबर 2012

कहानियाँ किस्से सुनना अब भाता नहीं



कहानियाँ 
किस्से सुनना
अब भाता नहीं
खुद की
कहानियाँ  किस्से
सुनाने से ही फुर्सत नहीं
किसी और की 

हानियां कैसे सुनूं 
मेरी कहानियों में भी 
सब कुछ है
हंसना रोना,प्यार नफरत 

जब कुछ बचा ही नहीं
वही कहानियाँ 

सुन कर क्या करूँ
कहीं ऐसा ना हो
कुछ ऐसा सुनने को 

मिल जाए
जो मेरी कहानियों में 

नहीं है
डर लगता रहेगा
कहीं मेरे साथ भी 

ना हो जाए
खुदा  से दुआ करता हूँ
नयी कहानियाँ 

मत बनाना
जो बन चुकी 

ज़िन्दगी में अब तक 
सुनाने के लिए
वही बहुत हैं 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
742-38-20-09-2012
कहानियां,किस्से,जीवन,ज़िन्दगी