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शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

फूल मुरझा चुका था


फूल
मुरझा चुका था
पंखुड़ियां 
बिखर चुकी थी
महक हवा में 
मिल चुकी थी
किसी गले में 
हार बना कर 
पहनाया गया था 
अब धरती चूम रहा था
पैरों तले रौंदा
जा रहा था
इंसान की फितरत से
नावाकिफ था
अपनों तक को नहीं
बख्शता
फिर उसे कैसे बख्शता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
07-09-2012
729-25-09-12
इंसान,फूल,फितरत ,स्वार्थ,स्वार्थी, selected, 

ना जाने क्यों



ना जाने क्यों
लोग मन को मारते हैं
खुद को समेट लेते हैं
दहशत में जीते हैं
क्यों जीवन को
सहजता से नहीं लेते हैं
कुंठाओं के जाल से
मुक्त नहीं होते हैं
सोच के
पैमाने नहीं बदलते हैं
जीवन भर
गीली लकड़ी जैसे
सुलगते रहते हैं
जलते कम
धुंआ अधिक देते हैं
खुद भी व्यथित रहते हैं
दूसरों को भी व्यथित
करते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
07-09-2012
728-24-09-12
सोच,कुंठा,सहजता,व्यथित,जीवन

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

उन्हें तो बरसना है,केवल बरसना है



काले बादल 
गरजते बादल 
जल से भरे 
घमंड में चूर बादल 
उन्हें किसी से
क्या लेना देना
उन्हें तो बरसना है
केवल बरसना है
यह भी नहीं पता
कहाँ बरसना है
कितना बरसना है
चाहे किसी का 
घर ढह जाए
कोई पानी में बह जाए
पेड़ पौधे गल जाएँ
मानवीय भावनाओं से दूर
घमंड में सफलता की
ऊंचाइयां छू रहे
लोगों का भी यही हाल है
वो भी केवल
अपने लिए ही जीते हैं
उनकी भूख मिटनी चाहिए
किसी और से उन्हें
क्या मतलब
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
07-09-2012
727-23-09-12
जीवन ,स्वार्थ ,घमंड, मानवीय भावनाओं, भावनाएं,

गुरुवार, 18 अक्तूबर 2012

अपना पेट तो मैं भी भर लेता हूँ



दस साल के 
बच्चे को ढाबे पर 
बर्तन मांजते देखा
मन दुखी हुआ
उससे पूछ लिया
इतनी छोटी उम्र में
पढ़ते क्यों नहीं
काम क्यों करते हो
उसके जवाब ने मुझे
निरुत्तर कर दिया
कहने लगा
बाबूजी आपने पढ़ कर
क्या पा लिया
अपना पेट 
भरने के सिवाय
कितने भूखों का 
पेट भर दिया
कितने बच्चों को स्कूल
पढने भेज दिया
केवल बातें बनाना ही
तो सीखा है
वो तो मैं भी कर लेता हूँ
अपना पेट तो मैं भी
भर लेता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
07-09-2012
726-22-09-12
बाल श्रमिक,शिक्षा,पढाई,जीवन ,बचपन,भूख,गरीबी,

किसको भूलूँ ? किस को याद करूँ ?



किस को भूलूँ ?
किस को याद करूँ ?
समझ नहीं आता है
कैसे भूलूँ ,?
क्यों याद नहीं करूँ ?
तय नहीं कर पाता हूँ
किसी ने दिल को लुभाया
जीने का अर्थ बताया
कठिनाइयों से लड़ना सिखाया
किसी ने मन को तड़पाया
जीवन की सच्चाई का
दर्शन कराया
कुछ न कुछ हर एक से पाया
कोई साथ है कोई चला गया
अभी और भी मिलेंगे
जीवन यात्रा में साथी कई
प्रश्न फिर भी
न सुलझ पायेगा
सदा मन को कचोटेगा
किसको भूलूँ ?
किस को याद करूँ ?
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
07-09-2012
725-21-09-12
जीवन,यादें ,भूलना

बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

घमंड



नीलगिरी के
लम्बे ऊंचे पेड़
आसमान को छूने की
कोशिश में
घमंड में सीना ताने
खड़े रहते हैं
उसके आस पास लगे
छोटे पौधों की तरफ
झांकते तक नहीं
कोई राहगीर उनकी
छाया में बैठता नहीं
ना तो वो
आसमान को छू पाते
ना ही उन्हें किसी की
दुआ मिलती
06-09-2012
724-20-09-12
दुआ, घमंड, नीलगिरी

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

जो मिल गया उसकी कद्र नहीं



जो मिल गया
उसकी कद्र नहीं
जो नहीं मिला
निरंतर उसके सपने
देखता इंसान
देखे जो भी सपने पहले
पूरे हो जाते तो 
 भूल जाता इंसान
नयी इच्छाएं संजोने
लगता
नए सपने देखने लगता
भूल जाता
कभी रुकता नहीं
इच्छाओं का संसार
जो फंस गया
इच्छाओं के चक्रव्यूह में
फिर निकल नहीं पाता
कभी बाहर
जीना भूल जाता
बेचैनी मोल लेता
उलझ कर रह जाता
उसका संसार
जितनी
ज़ल्दी मुक्ती पालो
इच्छाओं से
जीवन उतना ही
साकार
06-09-2012
723-19-09-12
जीवन ,बेचैनी,इच्छाओं के चक्रव्यूह ,इच्छाओं का संसा,.सपने,इच्छाएं

सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

ह्रदय के द्वार पर

हृदय के द्वार पर
निरंतर
खट खट तो होती है
मगर मजबूरियां,
जिम्मेदारियां
कर्तव्य पथ से
भटकने नहीं देती
भावनाओं को
नियंत्रण में रखती हैं
द्वार पर खड़े
चाहने वालों के लिए
चाहते हुए भी
द्वार नहीं खोलने देती
बाहर खड़े
लोगों की पुकार
निरंतर
कानों में गूंजती रहती
दौड़ कर बार बार
द्वार तक पहुंचता हूँ
कर्तव्य का ध्यान आते ही
कदम पीछे लौटाता हूँ
जानता हूँ
जीवन में हर इच्छा की
पूर्ती नहीं हो सकती
इच्छाएं,आकांशाएं
सर उठाती रहती हैं
ज्वार भाटे सी
आती जाती हैं
उन पर नियंत्रण
सही दिशा देना भी
आवश्यक है
संयम से काम लेता हूँ
मन को समझाता हूँ
हृदय को पुचकारता हूँ
खुशी से तय करता हूँ
ह्रदय द्वार बंद ही रखूँ
कहीं ऐसा ना हो
जो मेरे अपने हैं
हृदय में बसे हैं
अपने आप को
पराया समझने लगे
उनके प्रति
असीम प्यार और मोह
क़दमों का संतुलन
बनाए रखता है
मुझे लडखडाने नहीं देता
यह पता होते भी
मेरे चाहने वालों के
ह्रदय को ठेस पहुंचेगी
अगर वे ह्रदय से
मुझे चाहते हैं
तो मेरी जिम्मेदारियों
मजबूरियों को समझ कर
क्षमा कर देंगे
मूक रह कर पहले से
अधिक चाहते रहेंगे
कर्तव्य पथ से नहीं
भटकने देंगे
मैं उनके मन में
वो मेरे मन में बसे रहेंगे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर     
03-09-2012
722-18-09-12
जिम्मेदारियां,ह्रदय,मजबूरियां,कर्तव्य पथ ,भावनाओं,निरंतर,जीवन,इच्छाएं,आकांशाएं,संयम

हम भी काँटों से घिरे हुए हैं


गुलाब  की तरह
हम भी काँटों से
घिरे हुए हैं
ज़हन में नफरत के
कांटे बसाए लोग
सुकून की पंखुड़ियों को
छेदने की कोशिश में
लगे हुए हैं
पर हम गुलाब जितने
भाग्यशाली नहीं
बार बार हैरान तो होते हैं
दर्द से करहाते भी हैं
मगर गुलाब से
मुस्काराना  सीखा
वो हमें रोने नहीं देता
हम हालात को खुशी से
बर्दाश्त करते रहते
चेहरे से मुस्काराहट को
जाने नहीं देते
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-09-2012
721-17-09-12
नफरत,सुकून,मुस्काराना ,मुस्काराहट

रविवार, 14 अक्तूबर 2012

काश मन की बात आँखें जान लेती



दिल क्या कहता है
मन को पता चल जाता
मन क्या सोचता है
आँखों को खबर नहीं होती
वो वही देखती रहतीं
जो उसे दिखाई देता
जो नहीं चाहती 
वो भी देखना पड़ता
काश मन की बात
आँखें जान लेती
सुकून की
इन्तहा हो जाती
किसी और चीज़ की
ज़रुरत ना होती
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
03-09-2012
720-16-09-12
सुकून,मन,चैन,आँखें,दिल,ह्रदय

वर्षा पर कविता -सूरज ने घर के दरवाज़े बंद कर लिए


सूरज ने
घर के दरवाज़े
बंद कर लिए
उजाले को
घर के अन्दर
छुपा लिया
आकाश में काला
अन्धेरा छा गया
इंद्र ने मौक़ा ताड़ा
घनघोर बादलों को
भेज दिया
बादल उमड़ घुमड़ कर
बरसने लगे
नदी नाले बहा दिए
किसानों के चेहरे
चमकने लगे
अग्नी भी चुप नहीं रही
आकाश में बिजली बन
चमकने लगी
वरुण ने
भेज दी ठंडी हवाएं
वातावरण को
ठंडा कर दिया
पक्षी नीड़ों में छुप गए
मिट्टी महकने लगी
बच्चे मस्ती में नाहने लगे
वर्षा के गीत गाने लगे
बारिश बारिश आयी
हर चेहरे पर ख़ुशी छा गयी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-09-2012
719-15-09-12

वर्षा,बारिश ,बरसात,सूरज,इंद्र,वरुण,अग्नि, बादल

अब कोई मुझे मनहूस ना समझे

बारिश की बूँदें
जब मेरे कमरे की
खिड़की पर टप टप
दस्तक देती हैं
ख्यालों में डूब जाता हूँ
कभी खुदा भी
मेरी किस्मत पर
रहम की बारिश कर दे
ऐसी ही आवाज़ से
सारी दुनिया को बता दे
मेरी बदकिस्मती
ख़त्म हो गयी है
अब कोई मुझे 
मनहूस ना समझे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-09-2012
718-14-09-12
मनहूस,किस्मत,ख्याल