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शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

कैसी विडंबना है



कैसी विडंबना है
लोग तीर कमान
पकड़ना भी नहीं जानते
खुद को माहिर तीरंदाज़ कहते हैं
सहारे बिना चल भी नहीं पाते
अनुभव की बात करते हैं
खुद को पहचानते नहीं
दुनिया को पहचानने का
दावा करते हैं
बातें करने में उस्ताद
कुछ करने के नाम पर
निकम्मा साबित होते हैं
फिर भी सुधरने का
नाम तक नहीं लेते
02-09-2012--717-14-09-12
विडंबना, अनुभव

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

लोग कहते मुझ को



लोग कहते थे
निरंतर
वर्षों के अनुभव से
लोगों को
 समझाया करो
जब भी समझाने की
कोशिश करता हूँ
लोग मुझे ही समझाने 
लगते हैं
खुद को समझदार
मुझे बेवकूफ बताने 
लगते हैं
अब लगने लगा है
 ज़िन्दगी भर
बेवकूफों के साथ
 जीता रहा
बेवकूफियां करता रहा
उम्र के इस पड़ाव पर
समझदार लोगों से
पहली बार पाला पडा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
02-09-2012
716-13-09-12
अनुभव

सब होड़ में जी रहे हैं



सब होड़ में जी रहे हैं
भीड़ में दौड़ रहे हैं
ये भी पता नहीं जाना
कहाँ है
नींद खो रहे हैं
चैन खो रहे हैं
ऊपर से ढिंढोरा पीट
रहे हैं
चैन की तलाश में ये
सब कर रहे हैं
कौन समझाए उन्हें
इच्छाओं के जाल में
फंस कर
किसे चैन मिला है
जो उन्हें मिल जाएगा
माया मोह में
ज़िन्दगी भर रोते रहे हैं
रोते ही रह जायेंगे
ना चैन मिलेगा
ना संतुष्टी मिलेगी
खाली हाथ आये थे
खाली हाथ चले जायेंगे

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-09-2012/715-12-09-12
संतुष्टी ,होड़,चैन,भीड़,इच्छाएं ,जीवन,ज़िन्दगी,

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

पसंद ना पसंद के कैसे कैसे पैमाने मन के



पसंद ना पसंद के
कैसे कैसे
पैमाने मन के
किसकी को चमड़ी
किसी को दमड़ी प्यारी
किसी को
जात बिरादरी प्यारी
कोई गले की
आवाज़ के पीछे मरता
कोई अभिनय की
दाद देते ना थकता
किसी को
पसंद बातें किसी को
अदाएं किसी की
कोई रूप रंग का प्यासा
किसी पर दबंग
किसी पर शालीन भारी
कोई ज्ञान का पुजारी
कोई हूनर पर वारी
कोई जुबान से निकली
वाणी का उपासक
कोई कलम से निकले
शब्दों को चाहता
कोई कर्मों से प्रभावित
कोई कृत्यों पर जान
छिड़कता
बहुतों को शांत सरल
स्वभाव भाता
हँसता चेहरा सब को
लुभाता
हर मन के
अपने अपने पैमाने
जो एक को भाये
दूजे को ना भाये
मन तो मन है
नित नए रंग दिखाए
नए नाच नचाये
हर मन के
पसंद नापसंद के
पैमाने अलग अलग


डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
02-09-2012
714-11-09-12
पसंद ना पसंद ,पैमाने,मन

जी करता है तुझे जाने ही ना दूं



जी करता है
तुझे जाने ही ना दूं
ना माने तो
तेरा साया बन कर
तेरे साथ चलूँ
कोई देखे तो 

पहचाने नहीं मुझ को
लगे जैसे देखा तुझ को
तेरे खातिर
खुद का वजूद मिटा दूं
तुझ में इतना
ज़ज्ब होना चाहता हूँ
मेरा अक्स भी तेरा लगे
दो जिस्म एक जान
होना चाहता हूँ 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-09-2012
713-10-09-12
मोहब्बत,दो जिस्म एक जान

मिला था अनजान बन कर



मिला था
अनजान बन कर
 बहार बन कर 
दिल पर छा गया 
चेहरे पर चेहरा
चढ़ा कर आया था
खिजा साथ 
छुपा कर लाया था
दोस्त के भेष में
दुश्मन निकला
मोहब्बत का सिला
ऐसा दिया
ना जीने दिया 
ना मरने दिया
कातिल बन कर
साथ निभाता रहा
जाते जाते तोहफे में 
तन्हाई दे गया 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-09-2012
712-09-09-12
मोहब्बत ,चेहरे पर चेहरा,अनजान ,मोहब्बत का सिला,दोस्त,दुश्मन

बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

कैसे कहूँ मैं वो नहीं हूँ



कैसे कहूँ
मैं वो नहीं हूँ
जो तुमने समझा मुझे
मैं वो हूँ जो जाना नहीं
अब तक तुमने
ना मैं तुमसे प्यार करता हूँ
ना तुम्हारा दोस्त हूँ
ना रिश्तेदार ना पड़ोसी
ना जान पहचान वाला
ना तुम्हारे शहर में
रहता हूँ
ना तुमसे मिला
ना देखा कभी
मेरी बातें सुन कर
परेशान मत होना
मुझे सिर फिरा भी
मत समझना
तुम्हें मन में बसा रखा है
तुम मेरी साधना
मैं तुम्हारा साधक हूँ
तुम्हारी साधना से
मुझे चैन मिलता है
जीना सार्थक होता है
तुम मेरे लिए
पञ्चतत्व हो
जिनके बिना जीना
असंभव है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-09-2012
712-08-09-12
साधक ,साधना,पञ्चतत्व

सामंजस्य पर कविता -सामंजस्य



चलते चलते पैर
थक कर चूर हो गए
कहने लगे
अब विश्राम करना चाहिए
आँखों ने सुना तो तुरंत बोली
हम तो नहीं थके
बस पानी के कुछ छींटे डाल दो
पर चलना बंद मत करो
जूतों ने सुना तो बोले
अभी से थकने की बात ही
क्यों करी ?
मैं तो बिना थके
जितना अब तक चले
उससे भी अधिक चल
सकता हूँ
कान बोले जैसा सब कहे
वैसा ही कर लो
मुझे सब मंज़ूर है
गला बीच में बोल उठा ,
प्यास लग रही है
थोड़ा सा पानी पिला दो ,
थोड़ा विश्राम कर लो
फिर चलना प्रारम्भ कर दो
ह्रदय बोला रुकेंगे नहीं
मुझे प्रियतम से मिलने की
ज़ल्दी है
सब की बात सुन कर
मन बोला,सब्र रखो ,
हम सब एक परिवार के
सदस्य हैं
ध्यान से सोचो
थके मांदे ह्रदय को देख
प्रियतम खुश नहीं होगी
आँखें गंतव्य पर पहुँच कर
थकान से नींद की गोद में
पहुँच जायेंगी
रही जूतों की बात ,
उन्हें तो अधिक चलने की
आदत है ,
तो किसी का भी भला नहीं होगा
गले की प्यास बुझा कर
थोड़ा  विश्राम कर लेते हैं ,
फिर तरोताजा हो कर आगे चलेंगे
मुझे सब की भावनाओं का
ख्याल रखना है
सफल और आनंददायक
यात्रा के लिए सब में सामंजस्य
बिठाना अत्यंत आवश्यक है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
02-09-2012
711-07-09-12
सामंजस्य

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

होश में भी मदहोश हो बैठे



होश में भी 
मदहोश हो बैठे
दवा समझ कर 
शराब पी बैठे
नज़र से नज़र 
क्या मिली 
दिल दे बैठे
सुकून की जगह 
बेचैनी ले बैठे
बेफिक्र हो कर 
सोते थे पहले
अब पलक तक 
झपका ना पाते
बैठे ठाले रतजगा 
गोद ले बैठे
दर्द-ऐ-दिल की 
दवा चाही थी
कातिल को 
चारागार समझ बैठे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
चारागार –डाक्टर
02-09-2012
710-06-09-12
होश ,मदहोश,सुकून ,बेचैनी,बेफिक्र,दर्द-ऐ-दिल

सोमवार, 8 अक्तूबर 2012

आज फुर्सत में भी फुर्सत नहीं उन्हें हमारे लिए



आज फुर्सत में भी
उन्हें फुर्सत नहीं 
हमारे लिए
फिर भी कहते हैं 
दिल से चाहते हमें
क्या सच ? क्या झूठ ?
या तो खुदा जाने 
या उनका ज़मीर जाने 
हमारा तो दिल बस
उनके लिए ही धडकता
हर सांस पर
उनका ही नाम होता
ना मिले चाहे फुर्सत उन्हें
जीने के लिए
उनकी याद ही काफी है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-09-2012
709-05-09-12
प्यार,मोहब्बत,फुर्सत,याद,यादें

पीढी अंतराल(Generation Gap) पर कविता- हम तो गुजर जायेंगे




हम तो गुजर जायेंगे
याद करोगे वो बातें
जो कह कर जायेंगे
जब भी परेशान हो कर
खड़े होगे चौराहे पर
रास्ता पूछोगे
जब मिलेगा नहीं
कोई भी बताने वाला
आसूं बहाओगे
हम याद आयेंगे
खुदा से दुआएं करोगे
एक बार हमें 
ज़मीन पर भेज दो
फिर कभी लौट कर
जाने ना देंगे
इज्ज़त मोहब्बत से
अपने पास रखेंगे
जो गलती पहले करी
फिर ना दोहराएंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01-09-2012
708-04-09-12
बुढापा,उम्र,अनुभव,पीढी अंतराल

रविवार, 7 अक्तूबर 2012

अब फिर ज़ख्म खाने का मन करता



अब फिर ज़ख्म खाने का
मन करता है 
उनसे मिलने का दिल
करता है 
मिलेंगे तो हम पर तोहमत
लगायेंगे
हमें गुनाहगार करार देंगे
शहर भर में रुसवा करेंगे
हमें तो
आदत है ज़ख्म खाने की
चुपचाप दर्द सहने की
हमें गम नहीं होगा उनके
नफरत भरे अंदाज़ का
इस बहाने उन्हें देख तो लेंगे
कुछ अरसे
उनके ज़हन में तो रहेंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
01-09-2012
707-03-09-12
प्यार,मोहब्बत,तोहमत,गुनाहगार ,नफरत, ज़ख्म

प्रतीक्षा में



नदी किनारे
अनमने भाव लिए
कदम्ब के पेड़ के नीचे बैठी
विचारों के 
जाल में उलझी थी
गगन में काले बादलों की 
गडगडाहट
मन में 
विचारों का द्वन्द
व्यथा बढ़ा रहे थे
त्वरित गति से 
बह रही नदी 
पथ में आने वाली 
हर वस्तु को 
अपने साथ बहा कर 
ले जा रही
नदी के पानी की भाँती
 विचार भी त्वरित गति से 
आ जा रहे थे
मन में 
ढेरों आशंकाएं 
आकांशाओं को 
निराशा में बदल रही थी
प्रियतम से मिले 

महीनों हो गए
बार बार के वादों के
बाद भी नहीं आये
हर बार नए बहाने का
सन्देश अवश्य आया
प्रतीक्षारत थी
 कब नदी की धारा
मंद पड़ेगी
काले बादल विदा होंगे
नीले गगन के दर्शन होंगे
सूरज फिर चमकने लगेगा
उसकी प्रतीक्षा की
घड़ियाँ भी समाप्त होंगी
मन के आकाश में
आशाओं का सूरज चमकेगा
प्रियतम से मिलन होगा
निराशा के काले बादलों से
छुटकारा मिलेगा

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
01-09-2012
706-02-09-12
अनमने,भाव , प्रियतम,मिलन, प्रतीक्षा, विचार, सफलता ,घमंड ,इंतज़ार,प्रेम ,प्यार

जब भी चढ़ जाती है,कामयाबी सर पर



जब भी चढ़ जाती है
कामयाबी सर पर
अपने भी पराये लगते हैं
जो भी करे तारीफ़
वही अच्छे लगते हैं
कामयाबी के गरूर में
भूल जाता इंसान
सच्ची बात कहने वाले ही
अपने होते हैं
जब तक रहती है
कामयाबी
मीठी बातों से 
लुभाने वाले
तब तक ही साथ 
रहते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01-09-2012
705-01-09-12
कामयाबी,गरूर, सफलता ,घमंड