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शनिवार, 6 अक्तूबर 2012

ज़न्नत सी ज़िन्दगी को दोजख बना रहे हैं



महबूब की यादों के
चिराग जल रहे हैं
वो अकेले बैठे
आँखों से 
आंसू ढलका रहे हैं
सीने में दर्द के सैलाब
उठ रहे हैं
चाँद से चेहरे के सामने से
गम के बादल गुज़र रहे हैं
चेहरे के नूर को कम
कर रहे हैं
ज़न्नत सी ज़िन्दगी को
दोजख बना रहे हैं
26-08-2012
703-63-08-12
ज़िन्दगी,दोजख,यादें .याद,महबूब,आंसू

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

अब तुम्ही बताओ


तुम सोचते हो
नज़रों से दूर हो जाओगे
तो दिल से उतर जाओगे
बेरुखी दिखाओगे तो
भुला दिए जाओगे
तुम्हारी मोहब्बत में
खुद को ही भूल चुके हैं
सिवाय तुम्हारे
हमें कुछ और याद नहीं
हर सांस के साथ
तुम्हारा नाम लेते हैं
दिल की हर धड़कन पर
तुम्हारा नाम लिखा है
खुदा मान कर
इबादत करी तुम्हारी
मिलो ना मिलो
चाहे बेरुखी दिखाओ
अब तुम्ही बताओ
तुम्हें कैसे 
भूल सकते हैं हम
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
26-08-2012
702-62-08-12

ज़िन्दगी में उजाले के साथ अन्धेरा भी ज़रूरी



ज़िन्दगी में
उजाले के साथ
अन्धेरा भी ज़रूरी
हंसने के
साथ रोना भी ज़रूरी
दोस्त के साथ
दुश्मन भी ज़रूरी
ना हो गर सब
ना कोई खुदा की
 परवाह करेगा  
ना ही करेगा कद्र
ज़िन्दगी की
बन जाएगा हैवान
समझने लगेगा
खुद को
खुदा के बराबर

एक दिन

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
26-08-2012
701-61-08-12
ज़िन्दगी,उजाला,अन्धेरा

गुरुवार, 4 अक्तूबर 2012

कभी हँसी भी दे दे मुझे



या खुदा जी भर कर के
सज़ा दे दे मुझे
बस इतनी सी इल्तजा तुमसे
जितनी भी सज़ा देनी है
एक बार ही दे दे मुझे
यूँ तिल तिल कर ना
मार मुझे
हर लम्हा ना रुला मुझे
कभी जीने का मौक़ा
भी दे दे मुझे
रुआंसे चेहरे पर कभी
हँसी भी दे दे मुझे

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
26-08-2012
700-60-08-12
हँसी,खुशी,सज़ा ,इल्तजा,खुदा

मेरे ग़मों को मुझे ही सहने दो



मेरे ग़मों को 
मुझे ही सहने दो
आंसूओं को पीने दो
ना चुप कराओ
ना एक लफ्ज़
हमदर्दी का कहो
जो लिखा 
मेरी किस्मत में
मुझे ही भुगतने दो
जो चाहते नहीं 
हँसू कभी
उन्हें खुल कर हँसने दो
उनके दिल को सुकून
मिलने दो
बस एक ख्वाहिश
बाकी है दिल में
दुनिया से 
जाने से पहले
एक बार 
खुल कर हँस लूं
चाहने वालों से
एक छोटी सी
गुजारिश मेरी
बस इतनी सी 
दुआ कर लो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
26-08-2012
699-59-08-12
गम,आंसू,दुआ,किस्मत,हमदर्दी,ख्वाहिश

बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

दोस्ती में सौदा मत करो



खुद नफरत से 
जीते हो
बात बात पर 
रूठते हो
रुसवा करने की 
धोंस देते हो
हम से वफ़ा की
उम्मीद करते हो
निरंतर
अंगारे बरसाते हो
हमसे फूलों का
गुलदस्ता चाहते हो
क्यों नहीं समझते?
दोस्ती में निरंतर
लेने से
ज्यादा देना पड़ता
दुश्मन आसानी से 
मिलते है 
दोस्त किस्मत 
वालों को मिलते है 
दोस्ती में सौदा मत करो
दोस्ती की कद्र करो
इलज़ाम
लगाना बंद करो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
26-08-2012
698-58-08-12

दोस्त,दोस्ती,सौदा,नफरत

कुली



खुद की ज़िन्दगी का
बोझ कम करने के लिए
ज़िन्दगी भर
दूसरों का बोझ
उठाता
नहीं देखता
हिन्दू या मुसलमान
राजा या रंक
उसे तो मतलब है
ज़िंदा रहने के लिए
बोझ उठा कर
मिलने वाले  कुछ पैसों से
सवेरे का उजाला हो
या रात का अन्धेरा
बोझ उठाने को ना मिले तो
चेहरा रूआंसा हो जाता
उम्र कितनी भी हो जाए
हँसते रहने के लिए
बोझ उठाना ज़रूरी है
उत्तर से दक्षिण तक
पूरब से पश्चिम तक
हर रेलवे स्टेशन पर
मिलने वाला
लाल कमीज़
सफ़ेद पाजामे वाला
वो हमारा कुली है
26-08-2012
697-57-08-12
कुली,जीवन

मंगलवार, 2 अक्तूबर 2012

देश आज़ाद है



देश आज़ाद है
=========
बाप खदान में
पत्थर तोड़ता
माँ भट्टे पर मिट्टी
उठाती
फटे कपड़ों में बच्चा
कचरे के ढेर से थैलियाँ
बीनता
सुख की बात ही कहाँ ?
परिवार बामुश्किल
जीवित रहने के लिए
कड़ी धूप में झुलसता
एक दिन निकलता
शरीर पहले से अधिक
काला और कमज़ोर पड़ता
फिर भी बाप
छोटी सी खोली में
जिसका महीने का किराया
पत्नी के महीने भर की
मेहनत को लील लेता
प्रसन्नता से भगवान् को
धन्यवाद देता
कल का दिन निकल जाए
पेट भर जाए
मन से प्रार्थना करता
रात भर खांसता रहता
मकान,गाडी,का सपना
देखने का भी समय नहीं
मिलता
अभी ज़ल्दी भी कहाँ है
पेट की अग्नि बुझाने की
पक्की व्यवस्था हो जाए
तो वो भी देख लेगा
बातों में निरंतर सुनता
देश आज़ाद है
जनता की सरकार है
पर उसे
कोई फर्क नहीं पड़ता
उसे आजादी से
पहले और आज में
कोई फर्क नहीं लगता
जो अपने माँ बाप को
करते देखता था
वो भी वही कर रहा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
26-08-2012
696-56-08-12
स्वतंत्रता,आज़ादी ,आजादी ,देश,गरीबी

क्यों फ़िक्र करूं?



क्यों फ़िक्र करूं?
जो भी कहता हूँ
कहता हूँ
उनके भले के लिए
उन्हें परवाह नहीं तो
फिर मैं क्यों फ़िक्र करूं
मेरे प्यार को
जब नहीं समझ सके
तो मेरी फ़िक्र को
क्या समझेंगे
उनकी फ़िक्र में
खुद को क्यों दुखी करूँ
अब उम्मीद नहीं
समझेंगे मुझे कभी
वो अपने में मस्त
उन्हें मस्त ही रहने दूँ
क्यों रंग में भंग करूं
जब आयेगी खुद के
सर पर
खुद-ब -खुद समझ
जायेंगे
क्या होता है फर्क
अपने और पराये में
21-08-2012
686-46-08-12
पीढी  अंतराल ,अपने ,पराये, फ़िक्र
(पीढी  अंतराल (Generation Gap)के कारण छोटे,बड़ों की बात नहीं मानते हैं तो
हताशा में जो विचार मन में उठते हैं ,उन्हें दर्शाती है यह रचना )