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शनिवार, 29 सितंबर 2012

तुम फ़रिश्ता बनो ना बनो



तुम फ़रिश्ता
बनो ना बनो
इंसान तो बनो
स्वर्ग में जाओ ना जाओ
ज़मीन पर तो
इन्सान बन कर रहो
भगवान् से
प्रार्थना करो ना करो
इंसान से प्यार तो करो
मंदिर में जाओ
या मस्जिद में जाओ
शराफत से तो जियो
हँसो या रोओ
दूसरों को तो मत
रुलाओ
21-08-2012
681-41-08-12


जब नींद नहीं आती



रात को जब
ख्याल परेशान करते हैं
नींद नहीं आती 
तुम्हें याद करने लगता हूँ
ख़्वाबों में मिलने की
ख्व्हाइश करता हूँ
तुम कहोगी
तुम जुदा हो चुकी हो 
फिर क्यों तुम्हें याद
करता हूँ ?
जवाब सुन कर
नाराज़ ना होना
जब परेशान ही होना है
तो क्यों नहीं तुम्हें ही
याद करूँ
तुम्हारा सुन्दर चेहरा तो
दिखेगा
जुदाई में भी मिलन का
अहसास तो होगा 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
21-08-2012
680-40-08-12
शायरी,ख़्वाबों में,ख्वाब,जुदाई ,मिलन,मोहब्बत,ख्याल

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

ख्यालों को ज़हन में आने से कैसे रोकूँ

तुम ही बताओ
ख्यालों को  
ज़हन में आने से 
कैसे रोकूँ
ख़्वाबों को खुद से 
दूर कैसे रखूँ
 तंगदिल भी तो नहीं हूँ 
मेहमान को आने ही ना दूं
ये बात जुदा है
मेहमान 
पसंद का होता है 
उसे दिल से चाहता हूँ 
हकीकत में
बुलाने से तो आता नहीं 
ख्यालों ख़्वाबों में
बिना बुलाये भी 
चला आता है 
शायद ज़माने से डरता है
मोहब्बत छुपाता है 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

21-08-2012
679-39-08-12
शायरी, मोहब्बत, दिल, ख्यालों में,ख़्वाबों में, तंगदिल

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

यूँ ही मिल गया कोई



यूँ ही मिल गया कोई
चलते चलते
दिल में चिराग लिए
देखा जो अन्धेरा उसने
दिल में मेरे
चिराग मुझे थमा दिया
हो गया मैं भी रोशन
उसके इस कारनामे से
खुश हो कर
जब पूछा मैंने उससे
तुम्हारे दिल का क्या होगा
बड़ी शिद्दत से वो
कहने लगे
जिसको चिराग 
समझा तुमने
वो चिराग नहीं
मेरी मोहब्बत है 
जब तक जलती रहेगी
शमा मोहब्बत की 
दिल में तुम्हारे
यूँ ही रोशन करती
रहेगी
ज़िन्दगी तुम्हारी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
21-08-2012
678-38-08-12

शायरी, मोहब्बत, दिल

खामोश है फिजा



खामोश है फिजा
खामोश  हैं पेड़ पत्ते
खामोश है
तालाब का पानी
सब इंतज़ार में
कब मोहब्बत की हवा
चल जाए
मौसम खुशगवार
हो जाए
हसरतों के कंकर
ठहरे पानी में
ज़लज़ला मचाये
चारों तरफ
मोहब्बत की महक
फ़ैल जाए
फिजा में रवानी
आ जाए
21-08-2012
678-38-08-12
शायरी, मोहब्बत, हसरत

आहें



बरसात की छोटी बूंदों के साथ
कुछ आहें भी गिरी होंगी ज़रूर
जो छोड़ गए ज़मीं से साथ हमारा
उनके आंसू भी गिरे होंगे ज़रूर
जो बस गए जा कर ज़न्नत में
हमें याद करके रोते होंगे ज़रूर

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-08-2012
677-37-08-12
शायरी, दोस्त,आहें

बुधवार, 26 सितंबर 2012

रोज़ की तरह



रोज़ की तरह
आज भी बहुत
इंतज़ार के बाद भी
वो नहीं आये
वैसे भी अब
वो कहाँ आते हैं
हम तो यूँ ही
उन्हें याद करते हैं
उन्हें भुला जो नहीं
पाते  हैं
21-08-2012
676-36-08-12
शायरी, याद, इंतज़ार, यादें

हमें क्या पता था



हमें क्या पता था 
उनकी अदाओं पर 
मर मिटेंगे हम 
सुकून की ज़िन्दगी में 
उबाल लायेंगे हम 
हमने तो यूँ ही तारीफ़ मेंउन्हें
दिल-ऐ-ख़ास कह दिया 
उन्होंने हकीकत में 
हमें दिल ही दे दिया
हम ठहरे नामुराद इतने 
उन्हें हकीकत से
वाकिफ करा दिया 
अब ना सो पाते हैं 
ना जाग पाते हैं 
हर लम्हा उन्हें 
मनाते हैं 
वो मुंह फुलाए बैठे हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 


21-08-2012
675-35-08-12
शायरी, दिल-ऐ-ख़ास, सुकून,अदा

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

फ़रिश्ते तक घबराए हुए हैं



ज़न्नत में फ़रिश्ते तक 
घबराए हुए हैं
ज़मीन पर 
उतरने से डर रहे हैं
खुदा से
फ़रियाद कर रहे हैं
चाहे दोजख में भेज दो
ज़मीन पर मत भेजो
हमें इंसान से दूर ही 
रहने दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
21-08-2012
674-34-08-12
व्यंग्य,इंसान,फ़रिश्ते,इंसान

हार किसी को मंज़ूर नहीं



चार दिनों का
सब्र भी नहीं किसी को
पल पल भारी लगता 
जीवन का
जब अहम् हो गया 
जान से प्यारा
क्या करना फिर
दोस्त और दोस्ती का
जो भी रह गया होड़ में पीछे
वही हारा कहलाता
हार किसी को मंज़ूर नहीं
क्या अपना क्या पराया
प्यार मोहब्बत गए भाड़ में
हर इंसान
फिर दुश्मन लगता

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-08-2012
673-33-08-12,

उम्र का बोझ


जब उम्र का
बोझ बढ़ जाता है 
लाचारी जीवन का
सच बन जाता है 
मजबूरी में जीना पड़ता है
कदम कदम पर
समझौता करना पड़ता है
बाप को बेटा बन कर
रहना पड़ता है
हँसते हुए दिखना होता है
खुश हूँ कहना पड़ता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-08-2012
672-32-08-12,
बुढापा,उम्र,लाचारी,जीवन ,मजबूरी

सोमवार, 24 सितंबर 2012

तनहा हूँ भी तनहा नहीं भी



रोज़ दिखते हैं नए नए चेहरे
दिखते नए नए नए मंज़र भी

मिलता हूँ नए नए लोगों से
देखता हूँ नए नए नज़ारे भी

दिखते तो साए भी हैं रोज़ हमें
कभी निभाते नहीं साथ वो भी

इतनी भीड़ में भी अकेला हूँ
तनहा हूँ भी तनहा नहीं भी

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-08-2012
671-31-08-12
शायरी ,तनहा,तन्हाई,अकेलापन,शायरी

रविवार, 23 सितंबर 2012

जीवन का बदलता रंग



नए मकान की 
दीवारों के रंग जैसे 
परिवार की दीवारों का 
चमकता,दमकता
सब से खूबसूरत रंग
होता था
समय के अंतराल में
मकान में नए नए 
कमरे बनते गए
परिवार में भी
नए सदस्य जुड़ते गए
दिन पर दिन
मकान जैसे ही 
मेरा रंग भी फीका
पड़ता गया
अपनी आभा खोता गया
रिश्तों की 
दीवारों से विश्वास
पपड़ी सा खिरता गया
अब बस इंतज़ार है
कब दीवारों का रंग
बदल दिया जाएगा
चमकता हुआ
नया रंग चढ़ाया जाएगा
नए रंग के सामने
फीका पड़ता जाऊंगा
समय के साथ
नेपथ्य में छुप जाऊंगा

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

21-08-2012
670-30-08-12
परिवार,जीवन,रिश्ते


मुझे तो मार दोगे



मुझे तो मार दोगे
पर अपनी फितरत को
कैसे मारोगे ?
अपनी नफरत को
कैसे मारोगे?
तुम कैसे बच पाओगे ?
खुदा के उसूलों को
याद कर लो
ना किसी हथियार की
ज़रुरत
ना ही किसी ज़हर की
दुनिया से उठाने
के लिएतुम्हारी नफरत से भरी
फितरत ही काफी है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

21-08-2012
669-29-08-12