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शनिवार, 22 सितंबर 2012

हर तरीका आजमाया हमने



हर तरीका
आजमाया हमने
हमारी तरफ
गर्दन तक नहीं
घुमायी उन्होंने
आदत से मजबूर थे
हमें छिछोरा समझते रहे
शक से देखते रहे
घमंड में
नाक की सीध में
चलते रहे
उन्हें पता नहीं था
हम सड़क पर गिरे
उनके कानों के झुमके को
लौटाने की
कोशिश कर रहे थे
21-08-2012
668-28-08-12

उनकी खुशी के लिए



चाहने वाले
चाहते हैं
उनकी खुशी के लिए
अपना वजूद ही खो दूं
मैं सोचता हूँ
क्यों न खुद को ही
नेस्तनाबूद कर दूं
मौत का इलज़ाम
खुद पर ही लगा दूं
उन्हें तकलीफों से
बरी कर दूं

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-08-2012
667-27-08-12

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

उसे देखते ही



उसे देखते ही
मोहब्बत के बादल
दिल में गरजने लगे
खुशी से झूम कर बरसेंगे
प्यार की नदियाँ
उफन कर बहने लगेगी
दोनों के बीच
कोई दूजा ना होगा
दो हो कर भी हम एक होंगे
दो साज़ एक सुर होंगे
बस उसकी रज़ा का
इंतजार है
जब तक नहीं मिले
बरसात के मौसम में भी
सूखे का अहसास
होता रहेगा
21-08-2012
666-26-08-12

इतना खौफज़दा हूँ



तुम से मिलने से पहले ही
दिल पर पत्थर रख कर
यादों के ताजमहल
बना लिए मैंने
मुझे पता नहीं मिल कर
क्या सोचोगी
क्या कहोगी मुझसे
जब तुमसे पूछूंगा
अभी से बता दो
तुम्हारा इरादा क्या है
क्या तुम भी वैसे ही
ज़ज्बातों से खेलोगी ?
जैसे हर मुस्कारा कर
मिलने
वाले ने खेला अब तक
क्या करूँ?
इतना खौफज़दा हूँ
इतनी बार धोखा खाया है
यादों के सहारे जी लूंगा
पर फिर धोखा नहीं
खाऊंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

शायरी,
21-08-2012
665-25-08-12

कुछ आंसू बचा कर रखूंगा



कुछ आंसू
बचा कर रखूंगा
ज़िन्दगी के आख़िरी
लम्हे में बहाऊंगा
उन अपनों के लिए
बहुत कोशिशों के
बाद भी जिन्हें 
अपनी वफ़ा का
यकीन ना दिला सका
तब तक उनका शक
दूर करने की कोशिश
करता रहूँगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
21-08-2012
664-24-08-12

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

जीवन की भट्टी में



जीवन की भट्टी में मन
अब तेज़ आंच
पर चढी कढाई सा
हो गया है
विचार उबलने लगे हैं
सब्र का पानी उफन रहा है
सब कुछ अस्त व्यस्त
करने के कगार पर
बेताबी से खडा है
इतनी उथल पुथल अब
ह्रदय से सही नहीं जाती
जिधर भी दृष्टि उठाता हूँ
सिवाय तनाव के
कुछ नज़र नहीं आता
ठहाके लगाते लोग,
बाहों में बाहें डाले दोस्त
अब लुप्त होते जा रहे
इर्ष्या-द्वेष ,होड़ का राक्षस
अट्टाहास कर रहा
शोर भरे जीवन में
लगने लगा है
अपने पराये में कोई
फर्क नहीं रहा
कोई किसी को सुनना
समझना नहीं चाहता
अपनी अपनी तूतीं
बजाना चाहता
निरंतर स्वार्थ में जीता
अहम् को जीवन का 
सूत्र समझने लगा है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
21-08-2012
663-23-08-12

इमानदारी बकवास है



इमानदारी बकवास है
पैसा,सत्ता, ताकत ही
सब कुछ है
लूट खसोट करना
भ्रष्ट होना सबसे उत्तम  है
ना यह सत्य है
ना भावनाओं का
उबाल
ना मस्तिष्क की उपज
ना ही ह्रदय की आवाज़
ये केवल
मेरी आँखों ने जो देखा
मेरे कानों ने जो सुना
मेरे शहर में
फुटपाथ पर लेटे
भूख से मर रहे
एक गरीब असहाय ने
आंसू बहाते हुए
जो कहा उसका
वर्णन है
21-08-2012
662-22-08-12

बुधवार, 19 सितंबर 2012

कभी कभी मुस्करा भी लिया करो



यूँ चुप रह कर
दर्द सहना ठीक नहीं
कुछ तो कहा करो
किसी और से नहीं तो
खुद से ही
बात कर लिया करो
माना यादें
परेशान करती हैं तुम्हें
उन्हें भूल जाया करो
यूँ हँसी चेहरे पर
गम ना लाया करो
कभी कभी मुस्करा भी
लिया करो
13-08-2012
661-21-08-12

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

वो मेरे साथ जो नहीं होंगी



इस बार भी बारिश में
पानी तो बरसेगा
पर बरखा की फुवारों में
भीगने का
मन नहीं करेगा
पेड़ों के पत्ते भी धुल कर
चमकने लगेंगे
पर मेरे चेहरे से
उदासी के बादल
नहीं छटेंगे
मिट्टी की सौंधी
खुशबू भी आयेगी
मेरे मन की उदासी
नहीं जायेगी
इस बार की बारिश में
वो मेरे साथ जो
नहीं होंगी
13-08-2012
660-20-08-12

मंजिल



सोलह की उम्र थी
हवा में दुपट्टा
बेहिसाब उड़ रहा था
जुल्फें बेख़ौफ़ लहरा रही थी
आँखों में अजीब सी
कशिश थी
गीत गुनगुनाते हुए
मदमाती चाल से
बेफिक्र चली जा रही थी
नज़र पडी तो दिल में
बिजली सी कोंधी
एक झपट्टे में दिल
ले गयी
यूँ लगा हुस्न परी
आसमां से ज़मीं पर
उतर आयी
पता नहीं था
अब तक जिस दिल को
कहाँ मंजिल
कहाँ ठिकाना उसका
आज तलाश पूरी हुयी
पता चल गया
कहाँ मंजिल उसकी
13-08-2012
659-19-08-12