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शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

गुनाह की सज़ा



बहुत अरसे के बाद
उनका ख़त आया
हमने समझा उनका
घमंड चूर हो गया
नफरत छोड़
अब क्यूं उन्हें
मोहब्बत का ख्याल आया?
ख़त खोला तो उसमें
लिखा था
हमारा हर ख़त ज़ला कर
राख कर देना
साथ बिताया हर लम्हा
भूल जाना
जुबां से हमारा नाम तक
ना लेना
तुम पर शक कर
हमने जो गुनाह किया
उसकी सज़ा खुद को दे रहे हैं
साथ में उनके भाई का
ख़त भी था
जिसमें लिखा था
ख़त खुदकशी के बाद
बहन की
लाश के पास मिला था
13-08-2012
658-18-08-12

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

तेरी यादों में डूबा हुआ



तेरी यादों में डूबा
समंदर किनारे बैठा हूँ
आती जाती लहरों को
देख रहा हूँ
कैसे मंजिल को छू कर
समंदर से 
मिलने से पहले लहरें
अपना निशाँ छोड़ जाती हैं
क्यूं तुम ऐसा नहीं करती ?
माना की मंजिल
बदल चुकी तुम्हारी
फिर भी
इतना तो याद होगा तुम्हें
कभी मैं ही था मांझी
किश्ती का तुम्हारी
मेरे रकीब से मिलने से पहले
मुझसे मिल कर लौट जाना
तुम्हारे छोड़े हुए निशानों
के सहारे ही उम्र गुजार दूंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
13-08-2012
657-17-08-12

ज़िन्दगी को समझने के लिए



ज़िन्दगी को
समझने के लिए
खुशी के साथ गम भी
ज़रूरी है
हँसी के साथ आंसू भी
ज़रूरी है
जीत के साथ हार भी
ज़रूरी है
क्रोध के साथ प्यार भी
ज़रूरी है
हर जान को
एक जान का साथ भी
ज़रूरी है
इंसान बन कर रहना भी
ज़रूरी है
ऊपर वाले की दुआ भी
ज़रूरी है
जिसने भी समझ लिया
सच ज़िन्दगी का
उसने ही समझ लिया
ज़िन्दगी को
उसको फ़िक्र करना फिर
ज़रूरी नहीं है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
13-08-2012
656-16-08-12

बुधवार, 12 सितंबर 2012

चिंतन,मनन के बाद !



रात भर 
सो नहीं पाया
धारा प्रवाह 
आने वाले विचारों से 
व्यथित होता रहा
किसी तरह आँख 
लगी ही थी
कानों में चिड़ियों की
चहचाहट सुनायी 
पड़ने लगी
सवेरे का उजाला ,
धूप की किरनें
कमरे में आने लगी
मेरे पास करने के लिए
दो ही उपाय हैं
या तो खिड़कियाँ खोल दूं
पर्दों को पूरी तरह हटा दूं
कमरे को ताज़ी हवा,
भरपूर उजाले से भर दूं
खुद भी प्रफुल्लित,
उल्लासित महसूस करूँ,
मन की चिंता भूल कर
अपने काम पर चल पडूँ
या फिर पर्दों को 
पूरी तरह खींच दूं ,
उजाले और हवा को
कमरे में आने ही ना दूं
चादर ओढ़ 
आँख बंद कर
फिर अँधेरे में लौट जाऊं
खुद को व्यथित करूँ ?
मन की पीड़ा को बढाऊँ?
चिंतन मनन के बाद
निश्चित कर लिया
अवसाद के झंझावत में
नहीं फसूँगा
फल मिले ना मिले
कर्म करता रहूँगा,
हर्षोल्लास पाने का
प्रयत्न नहीं छोडूंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
13-08-2012
655-15-08-12

क्या ज़माने का दस्तूर निभाते हो तुम ?



किस बात से
घबराते हो तुम
क्यूं इतना
खौफ खाते हो तुम
मुस्कारा कर मिले थे
दिल से दिल मिलाया
मन से मन मिलाया
अब पहचानते तक नहीं हो
वो तो चाहत का सौदा था
ये हक तो नहीं दिया था
मेरे ज़ज्बातों से खेलो
क्या ज़माने का दस्तूर
निभाते हो तुम ?
05-08-2012
654-14-08-12

वो छोटी बहन मेरी,मैं भाई उसका



बड़ा ही
नटखट अंदाज़ उसका
पल में
रूठना पल में हँसना
स्वभाव उसका
कभी छेड़ना कभी
नाराज़ होना
कभी गुस्से में मुंह
फुलाना
पता ही नहीं चलता
कब बरसेगी ?कब हँसेगी?
उसका रंग बिरंगा
सावन भादों सा व्यवहार
मुझ को बहुत भाता
जब चिड कर
उसके सतरंगी व्यवहार पर
उसको उल्हाना देता
पलट कर कह देती
मैं ऐसी हूँ,ऐसी ही रहूँगी
मेरी चिढ ख़त्म हो जाती
मैं भी कह देता
ऐसी ही अच्छी हो
ऐसी ही चटपटी रहना
सब को खुश रखना
यूँ ही मन को लुभाना
वो छोटी बहन मेरी
मैं भाई उसका
05-08-2012
653-13-08-12

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

पवित्र रिश्ते को केवल धागे से मत जोड़ो



पवित्र रिश्ते को केवल
धागे से मत जोड़ो
थोड़ा सा आगे बढ़ो
त्योंहार के पहले ही
त्योंहार मनाओ
हर दिन को रक्षाबंधन
समझो
जिससे रिश्ता नहीं कोई
उसे भी बहन कह दो
निरंतर उसकी रक्षा का
प्रण कर लो
तुमसे मांगे मदद
उससे पहले ही
आवश्यकता पूछ लो
पवित्र रिश्ते को नाम
ना दो
उसे स्नेह विश्वास से
जी लो
05-08-2012
652-12-08-12

अपनों ने इतना सताया उनको



कभी मिले नहीं
फिर  भी डरते हैं 
हमसे
क्यूं देख कर 
अनदेखा करते हैं
हम कभी समझे नहीं
शायद अपनों ने
इतना सताया उनको
किसी अनजान पर
ऐतबार नहीं कर पाते
हर चेहरे पर दाग
दिखते हैं
कैसे यकीन दिलाएं
हम हज़ारों मील दूर
बैठे हैं
चाहें तो भी उनके 
करीब नहीं पहुँच सकते
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
05-08-2012
651-11-08-12

सोमवार, 10 सितंबर 2012

कभी इंसान बन कर भी जिया करो




हमारे सीधेपन का 
मखौल न उडाओ
तीखेपन को न उकसाओ
अभी तक तो किसी का 
मज़ाक उड़ाना सीखा नहीं
अब कोई चाहत भी नहीं
अगर मजबूर करोगे
हम मुस्कारा कर सिर्फ
इतना कहेंगे
ऐ दोस्त कभी इंसान
बन कर भी जिया करो
इंसान को इंसान समझा करो
किसी की भावनाओं से 
खिलवाड़ मत किया करो 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर     

05-08-2012
650-10-08-12

न तुम्हारी जीत ज़रूरी ,न मेरी हार ज़रूरी



न तुम्हारी जीत ज़रूरी
न मेरी हार ज़रूरी
दिलों में 
नज़दीकी ज़रूरी
मैं हार भी जाऊं
पर दिल से नहीं लगाऊँ
तुम जीत भी जाओ
गर सर पर न चढाओ
अहम् से न भर जाओ
दिल आपस में 

वैसे ही मिलते रहेंगे
न इक दूजे से 
यकीन उठेगा
न दिलों में फासला बढेगा
मुझे हार में भी 
जीत का मज़ा मिलेगा
तुम जीत कर भी
दिल हार जाओगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-08-2012
649-09-08-12

रविवार, 9 सितंबर 2012

वो भाई बहन का रिश्ता ही क्या?



वो भाई बहन का
रिश्ता ही क्या?
जिसमें
लड़ना झगड़ना ना हो
रूठना मनाना ना हो
साथ हंसना रोना ना हो
एक दूजे का ख्याल
आता ना हो
मिले बिना चैन
आता हो
दूर रहो या पास
एक दूजे के बिना
मन खुश रहता हो
प्रेम का
धागा बांधो ना बांधो
हर पल
दुआ निकलती ना हो
03-08-2012
646-06-08-12

हम तो गिर कर उठते रहे हैं

जो भी चाल चलनी है
जिस को भी चलनी है
जी भर के चल ले
जितनी भी नफरत
रखनी है रख ले
हमें तो आदत है
दोस्तों को
दुश्मन बनते देखने की
कोई कितनी भी
कोशिश कर ले
हमें नेस्तनाबूद करने की
हम तो गिर कर उठते रहे हैं
फिर उठ जायेंगे
उनका क्या होगा
जिन्हें आदत सिर्फ गिराने की
इतना थक जायेंगे
हम को बार बार
गिराने की कोशिश में
खुद गिर गए एक बार भी
तो कभी उठ ना पायेंगे 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-08-2012
645-05-08-12