Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 8 सितंबर 2012

जब खुद की खुशी भी बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं हम



अब बहारों को भी
खामोश निगाहों से
देखते हैं हम
खुश होकर भी
ज़ाहिर नहीं करते हैं हम
खौफज़दा हैं
फिर ना लग जाए
हमारी ही
नज़र हम को ही
किसी और पर क्यूं
इलज़ाम लगाएँ
जब खुद की खुशी भी 
बर्दाश्त
नहीं कर पाते हैं हम
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
03-08-2012
644-04-08-12


शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

कितनी ज़ज्बाती थी बोतल

सागर किनारे
टहलते टहलते ,
मिली इक बोतल अनायास
छुपा रखा था
अपने दामन में उसने
इज़हार-ऐ-मोहब्बत के
लब्जों से भरा एक ख़त
ज़हन में ख्याल आया
कितनी ज़ज्बाती थी बोतल
खुद मय की 
बेवफाई भुगत रही थी
जो किसी के हलक में
उतर चुकी थी
बोतल खुद गम में डूबी
समंदर के पानी में
डूबकियां लगाती रही
मगर दूसरों के प्यार को
सीने से लगा कर रखती रही
कितनी ज़ज्बाती थी बोतल
खुद लुट गयी
मगर दूजे को लुटते
देखना नहीं चाहती थी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 03-08-2012
 643-03-08-12

मन का रिश्ता



घर से बाहर निकलते ही
एक लावारिस कुत्ता
मेरे पास आया
पूछ हिलाकर अभिवादन
करने लगा
मैंने भी उसे स्नेह से
पुचकार लिया
तीन वर्ष तक यही क्रम
निरंतर चलता रहा
समय एक साथ
हमारे बीच एक
अजीब सा रिश्ता हो गया
वह घर के बाहर मेरा
इंतज़ार करता
किसी दिन वह नहीं
दिखता
तो मन व्याकुल होने
लगता
उसकी प्रतीक्षा करता
ना उसे मुझ से
ना ही मुझे उससे कोई
आशा थी
हमारे मन का रिश्ता
दिन प्रतिदिन
प्रघाढ होता गया
सांयकाल दफ्तर से
घर लौटते  समय भी
मिलना आवश्यक हो गया 
अचानक
समय ने पलटा खाया
उसका दिखना बंद हो गया
कई दिन
व्याकुल व्यथित रहा
फिर भी उसे भूल ना पाया
पर एक प्रश्न ने
मन में जन्म अवश्य दे दिया
क्यों इंसान हर रिश्ते को
नाम देता
रिश्तों में मंतव्य ढूंढता
उन्हें शक से देखता
जब भी उस लावारिस
कुत्ते की याद आती है
आँखें नम हो जाती हैं
इंसानी रिश्तों की स्थिती
देख कर
मन में अजीब सी टीस
उठने लगती है
03-08-2012
642-02-08-12

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

महसूस न हो उन्हें कभी,कोई भाई नहीं उनके



बहन से
राखी बंधवा कर
मत समझ लो
भाई की जिम्मेदारी
पूरी हो गयी
जिसने नहीं बाँधी राखी
जिसका नहीं कोई भाई
उसको भी बहन मान लो
भले ही राखी ना
बन्धवाओ
पर भाई का फ़र्ज़
निभाओ
ऐसा अहसास कराओ
महसूस न हो उन्हें कभी
कोई भाई नहीं उनके
बड़े गर्व से कह सकें
सैकड़ों भाई हैं उनके
03-08-2012
641-01-08-12

हम खुद में इतने पागल हैं

हम खुद में इतने पागल हैं
अपनों को दुश्मन समझते हैं
ज़हर को अमृत समझ कर पीते हैं
खुशहाली हमको पसंद नहीं
बदनामी का डर नहीं
खुद के हाथों से 
खुद को आग लगाते हैं
खुद बेचैन रहते हैं
दूजे का चैन छीनते हैं
न खुद सो पाते हैं
न दूजों को सोने देते हैं
हँसती गाती ज़िन्दगी को
आंसूओं से भर देते हैं
हम खुद में इतने पागल हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
31-07-2012
640-37-07-12

बुधवार, 5 सितंबर 2012

आज जब इम्तहान का वक़्त आया



बहुत जीवट वाला
समझते थे सब मुझको
मैं भी खुद को
फौलाद समझता था
आज जब इम्तहान का
वक़्त आया
तो अपने को कमज़ोर पाया
फौलाद नहीं हूँ
सिद्ध करने के लिए
सबको
लाचारी बताने लगा
हकीकत से रूबरू
कराने लगा
कौन मानता हकीकत मेरी ?
खुद के ही जाल में
फंस गया
सबको चेहरे पर चेहरा
चढ़ा नज़र आया
बहुत फ़रियाद करी
नतीजा कुछ ना निकला
सबको सच में झूठ
नज़र आया
31-07-2012
639-36-07-12

पता चल जाता था क्या पकाया ?,क्या खाया उन्होंने ?




पता चल जाता था
क्या पकाया ?
क्या खाया उन्होंने ?
कहाँ गए थे?
कौन आया था घर उनके
कौन खुश हुआ?
कौन नाराज़ उनसे?
सुबह से शाम का
हर लम्हा आँखों के सामने
यूँ गुजर जाता जैसे
मैंने ही गुजारा हो
कभी मान मनुहार घर
बुलाने की
पसंद का खाना खिलाने की
फिर ना जाने क्या हुआ
बातों का सिलसिला
थम गया
रिश्तों का घडा चूने लगा
धीरे धीरे बातें कम
होने लगी
दुआ सलाम भी बंद
हो गयी
अध खिला फूल
पूरा खिले ही रह गया
वो अहसास
अब मन की टीस
बन गया
याद कर के खुद को
खुश रखना मजबूरी
हो गया
कब महकेगा ?
पाक रिश्तों का फूल
कब फिर भरेगा ?
बातों का मटका
निरंतर इंतज़ार में
रहता हूँ
उम्मीद में जीता हूँ
31-07-2012
638-35-07-12

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

हर सुबह से आज की सुबह कुछ ख़ास थी



हर सुबह से आज की
सुबह कुछ ख़ास थी
हर सुबह से अलग जो थी
साजों ने सुरों से सन्धी करी
संगीत की धारा बह निकली
चहचहाती चिड़ियों ने
चुप्पी साध ली
बहती पुरवाई थम गयी
पेड़ों के पत्ते
मदमस्त हो कर झूमने लगे
फिजा महक से सरोबार हो गयी
आज संगीत के साथ
प्रियतम की मधुर आवाज़ में
एक सुरीले गीत की गूँज थी
आज की सुबह खास थी
हर सुबह से अलग थी
उनकी वाणी की मिश्री
जो घुली थी
31-07-2012
637-34-07-12

ठहरे पानी में तुमने एक पत्थर फैंक दिया

ठहरे पानी में तुमने
एक पत्थर फैंक दिया
शांत वातावरण में   
ज़लज़ला मचा दिया 
मछलियों में
डर का संचार कर दिया
तुम्हारा चेहरा कुटिल 
मुस्काराहट से भर गया
मछलियों में
डर का संचार कर दिया
तुमने इतना भी नहीं सोचा
उनको डराने का अधिकार
तुम्हें किसने दिया
कभी सोचा तुमने
क्यों ऐसा व्यवहार किया
केवल इसलिए कि
वो निर्बल है तुमसे
अपने आमोद का
साधन बना लिया
अपने बल के घमंड में
निरीह मछलियों को
परेशान किया  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
31-07-2012
636-33-07-12

सोमवार, 3 सितंबर 2012

समझता था



समझता था
जीवन में बहुत कुछ पाया 
ज़िन्दगी को भरपूर जिया 
 बुढापा आराम से काटूंगा
जो नहीं किया अब तक
वह सब करूंगा
दुनिया छोड़ने से पहले
हर इच्छा पूरी  करूंगा
कितना गलत थी मेरी सोच 
जब देखा 
मेरे आस पास कोई खुश नहीं था
पहले तो समझा सब गलत
केवल मैं सही था
समय के साथ सब ठीक
हो जाएगा
कुछ इंतज़ार के बाद पाया
सब सही मैं ही गलत था
देर तो हो चुकी थी
मगर होश नहीं खोया था
निरंतर प्रयासरत हूँ  
जो मिला उसका सम्मान करूँ
जो नहीं मिला 
,  उसकी इच्छा नहीं रखूँ
जीते जी अपनों को खुश
नहीं कर सका
दुनिया से जाने से पहले
अगर उन्हें  खुशी नहीं दे सका
तो समझूंगा
जो भी किया अब तक 
सब व्यर्थ था
केवल अपने लिए जिया था
डा.राजेंद्र तेला,निरन्तर 
31-07-2012
635-32-07-12

आंसूओं से पूछा ,तुम बहते क्यूं हो



आंसूओं से पूछा
तुम बहते क्यूं हो
दिल से पूछा
तुम बेचैन क्यूं हो
मन से पूछा
तुम अनमने क्यूं हो
चेहरे से पूछा
तुम उदास क्यूं हो
चेहरा बोला
दिल बेचैन जो है
दिल बोला
मन अनमना जो है
मन बोला
आँखें नम जो हैं
चारों से एक साथ पूछा
सच बताओ वजह क्या है
चारों एक साथ बोले
तुम प्रियतम से दूर
अकेले जो हो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
30-07-2012
634-31-07-12

जोर जबरदस्ती से दबाते हैं लोग



उसने मुझे
अपशब्द कहे
मैंने धीरे से कहा
अपशब्द तो मत कहो
वो जोर से बोला
पहले तुमने कहे
मैंने धीमी आवाज़ में
उत्तर दिया
मैंने तो कुछ नहीं कहा
वो चिल्ला कर बोला
तुमने मुझे अपशब्द कहे
अब माफी मांगो
लोग इकट्ठा हो गए
मैं चुप रहा
क्या करूँ
समझ नहीं आया?
लोग भी चिल्लाने लगे
माफी मांगो
अब समझ आ गया
चिल्ला कर झूठ को सच
सच को झूठ साबित
कैसे करते हैं लोग
कैसे भीड़ को
अपने साथ लेते हैं लोग
ताकत के बल पर
रुलाते हैं
सच्चे इंसान को
जोर जबरदस्ती से
दबाते हैं लोग
29-07-2012
633-30-07-12

रविवार, 2 सितंबर 2012

क्या हमें भूल गए तुम ?



क्या हमें भूल गए तुम?
हमसे दूर रहकर भी
खुश दिखते हो तुम
या हमें सताने के लिए
खुश नहीं होते हुए भी
खुश दिखते हो तुम
क्या हमसे खफा हो तुम
जो हमसे दूर रहकर भी
खुश दिखते हो तुम
अब तुम्ही बताओ
कैसे मनाएं तुमको हम
हमसे दूर रहकर
खुश नहीं दिखो तुम

डा.राजेंद्र तेला,निरन्तर 
29-07-2012
632-29-07-12