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शनिवार, 1 सितंबर 2012

दर्द-ऐ-दिल किसी से कह ना सका



दर्द-ऐ-दिल
किसी से कह ना सका
मन ही मन घुटता रहा
दिल बेचारा भी थक गया
एक दिन कहने लगा
कब तक अकेले
ज़िन्दगी गुजारोगे
अब दर्द से किनारा कर लो
मुझे किसी से मिला दो
मन को सुकून
मुझ को राहत दे दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
29-07-2012
631-28-07-12

खुश होने की वजह



उन्होंने
हमारे खुश होने की
वजह पूछी
हमने असलियत
बयान कर दी
उनसे कह दिया
आपको खुश देखा तो
हम भी खुश हो गए
हमसे रहा ना गया
उनसे भी
उनकी खुशी का राज
पूछ लिया
जवाब में वो बोली
हम भी आपको देख कर
खुश हो रहे थे
29-07-2012
630-27-07-12

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

मुस्काराते चेहरे



हम 
इस लिए नहीं मुस्काराते
क्यों की हम खुश हैं
हम सिर्फ इसलिए मुस्काराते हैं
क्यों की मुस्काराते चेहरे 
सब को अच्छे लगते
29-07-2012
629-26-07-12

उनकी हर बात से डरता हूँ



उनकी हर बात से
डरता हूँ
कब तक रहेंगे खुश
समझ नहीं पाता हूँ
कब हो जायेंगे नाराज़
जान नहीं पाता हूँ
खुद से लड़ता रहता हूँ
निरंतर दुआ करता हूँ
कुछ कहना सुनना भी
छोड़ दिया
गलत ना समझ जाएँ
इस बात से डरता हूँ
अब खामोश रहता हूँ
अकेले में रोता हूँ
चुपचाप सहता हूँ
29-07-2012
628-25-07-12

नयी नवेली दुल्हन थी



प्रियतम तडके घर से
काम पर निकल गए
बिना प्रियतम दिन
कैसे कटेगा  ?
रात सुहानी थी
दिन कैसा होगा ?
कब लौटेंगे प्रियतम ?
सोच में डूबी थी
अनमने भाव से काम में
लगी थी
प्रियतम के बिना
मन उदास था
समय काटे नहीं कट
रहा था
सब बोझ लग रहा था,
बिना प्रियतम
बिन पानी के
मछली सी तड़प रही थी
उसका संसार अब
प्रियतम में सिमट
गया था
वही लक्ष्य ,वही सपना
वही अब जीवन उसका
नयी नवेली दुल्हन थी
विवाह के बाद की
दूसरी सुबह थी
29-07-2012
627-24-07-12

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

ईमान की बातें



ईमान की बातें
कहने सुनने में 
अच्छी लगती
अफ़सोस कि
हमेशा सच नहीं होती
पानी में चाँद की
परछाई सी होती
दिखती तो है
मगर हाथ लगाते ही
काई सी फिसल जाती
वक़्त  के गहरे पानी में
गुम हो जाती
कितना भी 
रखे ईमान कोई
कभी तो नियत 
डोल ही जाती
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर
29-07-2012
626-23-07-12

बुधवार, 29 अगस्त 2012

तब से अब तक



संगीत की
मदमाती धुनों के बीच
सहेलियों के साथ 

नृत्य में मग्न थी
सहसा हाथ को
सुहावना स्पर्श मिला
एक सुखद अनुभूती का
आभास हुआ
एक सिहरन शरीर में
दौड़ गयी
गूँज ह्रदय में 
पहुँच गयी 
ह्रदय उल्लास से 
कहने लगा
यही वो सपना है
जिसे तुम
निरंतर देखती रही हो
साकार करने के लिए
अब तक भटक रही हो
जाओ उसका 

आलिंगन करो
उसमें समा जाओ
उस ने 

तुरंत गर्दन घुमायी
मनमोहिनी सूरत को
देखते ही 
निस्तेज हो गयी
मुंह से एक
शब्द भी नहीं निकला
अब लक्ष्य की प्राप्ती
 हो जायेगी
विचारों में मग्न अपनी
सुध बुध खो दी
यथार्थ के संसार में लौटी 
सब कुछ धुंधला गया
लाख प्रयत्न के बाद भी
सिवाय सहेलियों के
कोई नहीं दिखा ,
सपना टूट गया
विश्वास ही नहीं हुआ
किनारे से मिलने से
पहले ही लहर 
आशाओं के समुद्र में
विलीन हो गयी
तब से अब तक फिर
लक्ष्य की खोज में
भटक रही है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
29-07-2012
625-22-07-12

मत देखो गिलास आधा खाली



मत देखो
गिलास आधा खाली,
देखो गिलास आधा भरा
मत देखो सिर्फ बुराईयाँ
अच्छाइयां भी देख लो
बुराईयाँ भूल जाओ
अच्छाइयां याद रखो
न व्यथित हो
न व्यथित करो
न पल पल गुण दोष देखो
न किसी को तोलो 
तुम में भी कमियाँ होंगी
बस इतना सा याद रखो
निरंतर खुश रहो
मुस्कराकर मिलते रहो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
28-07-2012
624-21-07-12


शौक या आदत



बातों को
हँसी में उड़ाना
पता नहीं
शौक या आदत उनकी
दोनों ही सूरतों में दिल
दर्द से तड़पता है
कितनी भी
शिद्दत से बताऊँ
ख्वाइश दिल की
वो हर बार सुन कर
हँसी में उड़ा देती है
24-07-2012
623-20-07-12

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

अन्धेरा



दिल-ओ-दिमाग का
अन्धेरा
रात के अँधेरे से ज्यादा
गहरा होता
रात के अँधेरे के बाद
उजाला आता
दिल-ओ-दिमाग का
अन्धेरा
कहर बरपाता
रिश्तों को तोड़ता
दोस्त को दुश्मन बनाता
मन का चैन छीनता
जीने की इच्छा कम
करता
जितना खुद को परेशान
करता
उतना ही दूसरों को भी
करता
निरंतर शूल सा चुभता
रहता
विचारों को
तहस नहस करता
जीवन से खुशियाँ छीनता
दिल-ओ-दिमाग का
अन्धेरा
रात के अँधेरे से ज्यादा
गहरा होता
24-07-2012
622-19-07-12

ना जाने क्यूं



ना जाने क्यूं 
उसकी तरफ 
खिंचता
चला जा रहा हूँ
रोके रुकता नहीं 
मन
दौड़ता है 
उसकी तरफ
पूछता है 
दिल से दिल से
क्यूं मिलता है
सुकून
उसे देखने 
उसे देखने
भर से
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

शायरी,दिल,मोहब्बत  
24-07-2012
621-18-07-12

दिल को समझाता रहा



रात भर दिल को 
समझाता रहा
यादों को ख्यालों में 
आने से रोकता रहा 
दिल इतना बेचैन था 
ज़िद पर अड़ गया 
महबूब की यादों में
खोने को मचलता रहा
नादाँ
इतना भी नहीं समझा
दिल एक बार टूट कर
बिखर जाता है 
फिर कभी नहीं जुड़ता
यादों का कतरा कतरा
ज़ख्म करता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
शायरी,दिल,मोहब्बत  
24-07-2012
621-17-07-12

सोमवार, 27 अगस्त 2012

इज़हार नहीं करेंगे


इज़हार नहीं करेंगे
चाहे हसरतों का
खून करना पड़े
दिल को तड़पना पड़े
कदम नहीं
डगमगायेंगे हमारे 
मुस्काराते चेहरों  से
दिल तो लगायेंगे
इज़हार नहीं करेंगे
24-07-2012
619-16-07-12

रोने की आदत



तुमसे गुजारिश है 
मेरी हसरतों को
हवा ना दो
मुझे कमज़ोर ना
बनाओ
आदत हो गयी है
अकेले में रोने की
गर मेरी
बन भी जाओगी तुम
रोने की आदत
कैसे छूटेगी ?
24-07-2012
620-17-07-12

इस दिल पर बस नहीं मेरा



इस दिल पर बस
नहीं मेरा
कितना भी समझाऊँ
समझता नहीं है
बार बार मचलता है
कोई अपना सा
ढूँढने की
जिद करता है
निरंतर भटकता है 
दिल मेरा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
24-07-2012
618-15-07-12

रविवार, 26 अगस्त 2012

मजबूर हूँ



खामोश रहे हैं
खामोश रहेंगे
जानते हैं
जुबां खोले बिना 
हसरतें परवान नहीं
चढ़ सकतीं
हर बात इशारों से
कही नहीं जा सकती 
मजबूर हूँ
इमानदारी की फितरत
जुबान से
कुछ कहने नहीं देती
24-07-2012
617-14-07-12

मल्हार



रिम झिम 
फुहारों के बीच
वादियों में
मल्हार की
सुर सरिता गूँज रही
खुदा से 
फ़रियाद कर रही
तान से तान मिला लो
मेघों को
जम कर बरसा दो
प्यासी धरती की प्यास
बुझा दो
हर चेहरे को खुशियों से
भर दो
दिलों में प्रेम के सुर
डाल दो
17-07-2012
616-13-07-12

हास्य कविता-चैन से रहूँगा



पत्नी बोली हँसमुखजी से
दिल में दर्द हो रहा है
हँसमुखजी बोले
दर्द की दवा ले लो
पत्नी बोली दिल का दर्द
दवा से ठीक नहीं होगा
जवाब मिला
बाम लगा लो
पत्नी बोली नासमझ हो
बाम से भी ठीक नहीं होगा
हँसमुखजी  बोले
डाक्टर को दिखा लो
पत्नी को गुस्सा आया
जोर से गुर्राई
निपट मूर्ख हो
समझते नहीं हो
डाक्टर दिल के दर्द में
क्या करेगा
जवाब मिला किसी
दूसरे को दे दो
पत्नी भन्नाई
फिर तुम क्या करोगे
क्या पापड बेलोगे
हँसमुखजी बोले
तुमसे पीछा छूट जाएगा
फिर चैन से रहूँगा
17-07-2012
615-12-07-12
(सम्पूर्ण नारी जगत से प्रार्थना है,इसे हास्य तक सीमित रखें ,ह्रदय से नहीं लगायें )

दोस्त ही लगा गया आग दोस्ती में



दोस्त ही लगा गया
आग दोस्ती में
दर्द-ऐ-दिल बताया
सच का आइना दिखाया
दिल से लगा लिया 
महफ़िल से ही बाहर कर दिया
हम पर ही बेवफाई का
इलज़ाम लगा दिया
हमें दोस्ती दुश्मनी के
फर्क में उलझा गया
दोस्ती के
नाम से ही  डरा गया
दोस्त ही लगा गया
आग दोस्ती में

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
17-07-2012
614-11-07-12