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शनिवार, 18 अगस्त 2012

पहली बारिश के बाद



पहली
 बारिश के बाद
मन डोलने लगा
उनसे मिलने को
तरसने लगा
हम बड़ी शिद्दत से
उनके
 घर का दरवाज़ा
खटखटाते रहे
उनसे मिलने को
तरसते रहे
वो बेखबर
गहरी नींद में
सोते रहे
सपनों की
दुनिया में गोते
लगाते रहे
25-06-2012
595-45-06-12

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

आज फिर फिसल गया,गहरी चोट खा गया



आज फिर फिसल गया
गहरी चोट खा गया
जिसने पकड़ा था हाथ
उसने ही छुडा लिया
मांझी ने ही किश्ती को
डूबा दिया
ना सुकून मिला
ना साहिल मिला
कातिल का असली
चेहरा दिख गया 
वफ़ा को बेवफाई में
बदलते देख लिया
आज फिर फिसल गया
गहरी चोट खा गया
25-06-2012
594-44-06-12

कौन कहता है?, आग पानी का साथ नहीं हो सकता



कौन कहता है ?
आग पानी का साथ
नहीं हो सकता
मैं सबूत हूँ
नफरत भरे रिश्तों की
आग में भी जीवित रहा
समस्याओं की कसौटी पर
खरा उतरता रहा
स्वाभिमान की आंच में
झुलसा अवश्य
पर सहन शीलता से
उस पर पार पाता रहा
नफरत के गर्म सूरज पर
सब्र की ठंडक से
विजय पाता रहा
भावनाओं की आग को
भभकने नहीं दिया
हिम्मत के पानी से
उसे बुझाता रहा
कौन कहता है ?
आग पानी का साथ
नहीं हो सकता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
25-06-2012
593-43-06-12

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

कौन कहता है ?


कौन कहता है ?
आग पानी का साथ
नहीं हो सकता
मैं सबूत हूँ
नफरत भरे रिश्तों की
आग में भी जीवित रहा
समस्याओं की कसौटी पर
खरा उतरता रहा
स्वाभिमान की आंच में
झुलसा अवश्य
पर सहन शीलता से
उस पर पार पाता रहा
नफरत के गर्म सूरज पर
सब्र की ठंडक से
विजय पाता रहा
भावनाओं की आग को
भभकने नहीं दिया
हिम्मत के पानी से
उसे बुझाता रहा
कौन कहता है ?
आग पानी का साथ
नहीं हो सकता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
25-06-2012
592-42-06-12

बुधवार, 15 अगस्त 2012

वटवृक्ष के सानिध्य में



आज फिर
व्यथित मन से
वटवृक्ष के नीचे आ
बैठा हूँ
सदा की तरह
सारी व्यथा रो रो कर
निकालूँगा
विशाल ह्रदय वाले
वटवृक्ष ने
सदा मौन रह कर
मेरी हर व्यथा को
धैर्य से सुना है
उसका मौन मेरे लिए
सदा ही
होंसला बढाने वाला
रहा है
मुझे विश्वास है
आज भी वही होगा
मेरे ह्रदय और मन को
चैन मिलेगा
वटवृक्ष अपना बड़प्पन
रखेगा
अपनी छाया में मुझे
हारने नहीं देगा
आज भी 
पहले से अधिक होंसले से
इसके सानिध्य से
उठ कर जाऊंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
25-06-2012
591-41-06-12

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

इच्छाओं की कस्तूरी



इच्छाओं की कस्तूरी
मनमोहिनी सुगंध से
मुझे निरंतर लुभाती
संतुष्टी के पथ से
डिगाने का
निष्फल प्रयत्न करती
मेरे संयम की बार बार
परीक्षा लेती
कभी मन करता
सब सूंघते कस्तूरी को
मैं क्यों पीछे रहूँ ?
प्रश्न मन का द्वार
खटखटाता
क्यों फिर कोई खुश नहीं?
उत्तर तो नहीं मिलता
स्वयं ही तय कर लेता हूँ
जब किसी ने भी
कामनाओं के संसार में
चैन नहीं पाया
सब इच्छाओं की कस्तूरी
सूंघ कर भी बेचैन हैं
मैं क्यों अपनी बेचैनी बढाऊँ?
जैसे हूँ वैसे ही खुश रहूँ
अधिक की कामना करे बिना
कर्म करता रहूँ
जो दिया इश्वर ने उसे
खुशी से स्वीकार करूँ
उसी ने दिया सब कुछ ,
वो चाहेगा तो
बिना मांगे ही दे देगा


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
25-06-2012
590-40-06-12

हास्य कविता -तुम कर सकते हो ?



फिरंगी
हँसमुखजी से बहस
करने लगा
पश्चिम की तारीफ़ में
कसीदे पढने लगा
हमने टीवी बनाया
दूर की घटना को
नज़दीक से देख सकते हैं
हमने फ़ोन बनाया
हज़ार मील दूर बैठे
व्यक्ति से
बात कर सकते हैं
बताओ हिन्दुस्तानियों ने
अब तक क्या करा?
हँसमुखजी बोले
अब इतनी भी डींग
मत मारो
हमारे यहाँ भी
ऐसे ऐसे महारथी हैं
जो बिना काम करे
हज़ारों मील दूर
स्विस बैंक में पैसा ज़मा
कर सकते हैं
तुम कर सकते हो ?
25-06-2012
589-39-06-12

सोमवार, 13 अगस्त 2012

पुराने हो गए हैं,तो क्या बदल दोगे


पुराने हो गए हैं
तो क्या बदल दोगे
कूडा समझ कर फैंक दोगे
ये भी सोच लो
नया कहाँ से लाओगे
तुम कह दोगे 
नए की ज़रुरत ही नहीं
कुछ करने से पहले 
खुद का भविष्य भी जान लो
खुद से ही प्रश्न पूछ लो
एक दिन तुम भी पुराने
पड़ जाओगे
क्या कूड़े सा फिकने को
खुद के बदले जाने
 के लिए
तैयार हो पाओगे
डा.राजेन्द्र तेला,निरंतर
25-06-2012
588-38-06-12

उम्मीद में


घर की मुंडेर से
चिड़िया उड़ कर
मेरे घर के
बगीचे में आयी
 यूँ लगा जैसे
उनका पैगाम लाई है
उदास चेहरे से
उसके पास गया
तो फुर्र से उड़ गयी
मुझे यकीन हो गया 
मेरा हाल जानने
आयी थी
तब से अब तक
चिड़िया के आने की
उम्मीद में
बगीचे में ही बैठा हूँ
कभी तो आकर
उनका हाल
बतायेगी
मिलने का पैगाम भी
साथ लायेगी
06-06-2012
578-28-06-12

रविवार, 12 अगस्त 2012

आज से पहले


आज से पहले
चमेली के फूलों में 
इतनी महक नहीं थी 
आज
क्या ख़ास हुआ
जानने के लिए
जब किसी से पूछा
मालूम हुआ
वो कुछ
वक़्त के लिए
उसके पास
रुकी थी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-06-2012
577-27-06-12

उन्होंने मुझे पुकारा

उन्होंने मुझे पुकारा 
मैंने भी मुस्कराकर
उनका अभिवादन किया 
पहले मिला नहीं आपसे
फिर भी बताइये
क्या काम है
तपाक से कह दिया 
वो पहले तो झेंपे
फिर मुस्काराकर बोले 
क्षमा करें गलतफहमी में
किसी और की जगह
आपको पुकार लिया 
अपना परिचय दिया 
पड़ोस की कॉलोनी में
रहते थे मेरे समकक्ष सरकारी
नौकर थे आज के समय में
जब जानने वालों से
रिश्ता निभाना कठिन
होता है गलतफहमी ने
हमारे बीच मित्रता का
मधुर रिश्ता बना दिया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
                                  06-06-2012
                                    576-26-06-12