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शनिवार, 11 अगस्त 2012

लूटने की तमन्ना में खुद लुट जाते हो


शाम होते होते 
चुग्गा दाना भूल कर 
पंछी भी घरोंदों में
लौट जाते हैं 
रात्रि विश्राम के बाद 
सुबह तरोताज़ा उठते
काम में लग जाते हैं  
तुम दिन भर श्रम करते हो 
रातों को जागते हो
सवेरे अलसाये उठते हो 
अधिक पाने की इच्छा में 
थके मांदे जुट जाते हो
ना तन को आराम
ना मन को विश्राम देते हो
ना हँसते हो ना गाते हो
भूल जाते हो 
जीवन में धन ही 
सब कुछ नहीं होता 
डूबते जाते हो
इच्छाओं के
 समंदर में डूबे रहते हो 
अंत तक
चैन नहीं पाते हो
लूटने की तमन्ना में
खुद लुट जाते हो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन  
06-06-2012
575-25-06-12

उम्मीद की छोटी सी किरण



उम्मीद की

छोटी सी किरण भी

अब किनारा लगती

मंजिल की दूरियां

कम लगती

अँधेरे में रोशनी की

किरण लगती

बुझे हुए चिरागों में

आग सुलगती 

उम्मीद टूटती

न रोशन होते चिराग

न मिलता किनारा

न दिखती मंजिल

फिर अंधेरी रात दिखती

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर


07-06-2012
587-37-06-12

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

लोगों ने पत्थर तो नहीं फैंके



लोगों ने
पत्थर से तो नहीं
बातों से मारा  मुझ को
बातों में 
मगर
वज़न पत्थर से भी 
ज्यादा था
इतना कि
उठ ही नहीं सका
दोबारा
फूल समझ कर
झेलता गया
उनकी हर मार पर
हँसता रहा
उनकी जुबान में
जवाब ना दे सका

अपने थे इसलिए
खून का घूँट पी कर के
चुपचाप सहता रहा

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
 
07-06-2012
585-35-06-12

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

क्यों नफरत से किसी को नफरत नहीं होती



 क्यों 
नफरत से
किसी को
नफरत नहीं होती
किसी सीने में कोई
चिंगारी नहीं उठती
सिर्फ बात करने से
नफरत ख़त्म
नहीं होती
अपने अहम् की
बली देनी होती
प्यार की
जुबां बोलनी पड़ती
बीमारी समझ
जड़ से काटनी होती
दिल और दिमाग की
सफ़ाई करनी होती
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
07-06-2012
584-34-06-12

मन की निकालना चाहता हूँ



बोलने से पहले
ही चुप कर दिया
जाता हूँ
कभी मौक़ा मिल
भी गया
सच कह भी दिया
 दो बात सुनता हूँ
गालियों से नवाज़ा
जाता हूँ
आदत से मजबूर हूँ
सब सहते हुए भी
सच बोलना चाहता हूँ
मन की निकालना
चाहता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
07-06-2012
583-33-06-12

बुधवार, 8 अगस्त 2012

माँ इश्वर की अत्युत्तम कृति

माँ इश्वर की
अत्युत्तम कृति
माँ की सुंदरता
अवर्णनीय
संतान रूठे
माँ नहीं रूठती
 कष्ट दे
रुष्ट नहीं होती
खुद सहती
दुःख सुलझाती
अपने से अधिक
संतान को चाहती
माँ इश्वर रूप होती
संतान पर
देवीय दृष्टि रखती
माँ कर्तव्य की
अंतिम कड़ी
इश्वर की
अत्युत्तम कृति
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
07-06-2012
582-32-06-12

न अब उम्मीद करते हैं न दुआ करते हैं



न अब 
उम्मीद करते हैं
न दुआ करते हैं
किस्मत समझ चुपचाप सहते हैं
अब तक मिला नहीं सुकून
मिल जाए तो खुश हो लेंगे
न मिला तो
हमेशा की तरह सह लेंगे
चुपचाप रो लेंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
07-06-2012
581-31-06-12

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

मन की गहराइयों में



मन की 
गहराइयों में
इर्ष्या द्वेष के बादल
घनघोर बरस रहे हैं
प्रेम बार बार
मन का द्वार
 खटखटा रहा है
प्रवेश पाने में असफल
घबरा कर मन के
मुहाने से ही लौट रहा है
कब बादल विश्राम लें
मन में प्रेम बस जाए
प्रतीक्षा में व्याकुल है


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
 
07-06-2012
580-30-06-12

कोई बता दे उसे कैसे मनाऊँ



ज़िन्दगी से लड़ते
उलझते थक गया हूँ
अब कहाँ से हिम्मत
कहाँ से सुकून लाऊँ
मिलते नहीं बाज़ार में
जो धन दौलत से
खरीद कर लाऊँ
दहशत का साया
ज़हन में छाया हुआ
कैसे उससे निजात पाऊँ
चेहरे पर हँसी का मुलम्मा
चढ़ाए घूम रहा हूँ
स्वछन्द हँसी कहाँ से लाऊँ
ज़ख्मों से भर गया है दिल
कौन सा मलहम लगाऊँ
अब सहारा
सिर्फ खुदा का बचा है
कोई बता दे उसे
कैसे मनाऊँ
07-06-2012
579-29-06-12

उन्होंने मुझे पुकारा

उन्होंने मुझे पुकारा मैंने भी मुस्कराकर
उनका अभिवादन किया पहले मिला नहीं आपसे
फिर भी बताइये
क्या काम है
तपाक से कह दिया वो पहले तो झेंपे
फिर मुस्काराकर बोले क्षमा करें गलतफहमी में
किसी और की जगह
आपको पुकार लिया अपना परिचय दिया पड़ोस की कॉलोनी में
रहते थे मेरे समकक्ष सरकारी
नौकर थे आज के समय में
जब जानने वालों से
रिश्ता निभाना कठिन
होता है गलतफहमी ने
हमारे बीच मित्रता का
मधुर रिश्ता बना दिया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-06-2012
576-26-06-12

सोमवार, 6 अगस्त 2012

लूटने की तमन्ना में,खुद लुट जाते हो



शाम होते ही पंछी भी
चुग्गा दाना भूल जाते  
घरोंदों में लौट जाते 
रात भर विश्राम करते 
सवेरे तरोताजा उठते 
तुम जागते हो रात भर
सवेरे अलसाए उठते 
अधिक पाने की इच्छा में
थके मांदे जुट जाते हो 
न तन को आराम
न मन को विश्राम देते हो 
इच्छाओं के समंदर में
डूब जाते हो 
न हँसते हो न गाते हो 
भूल जाते हो जीवन में 
काम के अलावा भी 
बहुत कुछ चाहिए 
अंत तक चैन नहीं पाते हो
लूटने की तमन्ना में
खुद लुट जाते हो

06-06-2012
575-25-06-12

दरख्तों के लम्बे साए



दरख्तों 
 के लम्बे साए
सूरज की किरणों के साथ
अँधेरे के घूँघट से निकल पड़ते
कभी छोटे कभी लम्बे होते
बहती बयार में
दरख्तों के साथ खुशी से  झूमते
उन्हें पता है
सूरज के ढलते ही
उन्हें भी अँधेरे में छुपना पडेगा
डूबते के साथ
उन्हें भी डूबना होगा
अपना अस्तित्व खोना होगा
जब तक अस्तित्व है
झूम सको जितना झूम लो
नहीं तो पछताना होगा

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
 
06-06-2012
574-24-06-12