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शनिवार, 4 अगस्त 2012

बेरहमी



तेज़ धूप में
उसका चेहरा
कुम्हला रहा था
पसीना किसी
झरने के पानी
सा बह रहा था
देख कर कुछ ऐसा
महसूस हुआ
जैसे किसी ने
बेरहमी से
बर्फ के टुकड़े को
तेज़ आंच पर
रख दिया
05-06-2012
571-21-06-12

खामोशी से सहना भी गुनाह होता



मुझे चोट लगी
मैं चुप रहा
मेरा दिल टूटा
मैंने कुछ नहीं कहा
मुझ पर पत्थर
फैंके गए
मैं हँसता रहा
मुझ पर इलज़ाम
लगाए गए
मैंने जवाब नहीं दिया
लोगों ने समझा
मैं गुनाहगार हूँ
पता नहीं था
खामोशी से सहना
भी गुनाह होता
इमानदारी से जीना
इतना दुश्वार होता
डा.राजेंद्र तेला,निरन्तर
05-06-2012
570-20-06-12

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

हर हाल में संतुष्ट रहते



गोधुली वेला
मैं गाँव से शहर की
ओर
गाँव बैलों का रेवड़
धूल उडाता गाँव की ओर
अग्रसर
धूल से सांस लेना
दूभर होने लगा
गाँव बैलों पर क्रोध
आने लगा
मन ही मन
 उन्हें कोसने लगा
क्रोध शांत हुआ
मन में विचार आया
गाय बैलों को भी
धूल कष्ट देती होगी
जब सड़क ही धूल भरी
तो धूल भी उडेगी
वो ना तो क्रोध करते
ना ही
कभी शिकायत करते
जो भी,
जैसा भी मिलता उन्हें
सहर्ष स्वीकार करते
हर हाल में संतुष्ट रहते
05-06-2012
569-19-06-12

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

राह मुश्किल हो गयी तो क्या चलना बंद कर दूं



राह मुश्किल हो गयी
तो क्या चलना बंद कर दूं
गिर गया तो क्या उठूँ नहीं
जो चलेगा वही तो गिरेगा
उठेगा नहीं तो
मंजिल पर कैसे पहुंचेगा
मैं उनमें से नहीं
जो हार मन कर बैठ जाते
मानता हूँ दर्द भी होता है
आँखों में आंसू भी आते हैं
लड़ता रहा हूँ ज़माने से
वक़्त के थपेड़ों से
हर बार अंत में मैं ही हँसा हूँ
इस बार भी मैं ही हँसूँगा
सदा की तरह चलता रहूँगा
हिम्मत होंसले से
आगे बढ़ता रहूँगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
05-06-2012
568-18-06-12

कुर्सी की व्यथा


कुर्सी की व्यथा
==========
सदियों से सब ने सदा
लिया ही लिया मुझ से
दिया कभी
धेला भर भी नहीं 
राजाओं ने ,नवाबों ने
विश्व के शीर्ष नेताओं ने
मुझे पाने के लिए
मौत का तांडव मचाया
युद्ध किये ,रिश्ते तोड़े
विश्वासघात किया
कुछ समय के लिए
मुझे पाया भी
लोग आते गए जाते गए
मैं वही की वहीं रही
हज़ारों वर्षों से
अब भी
वही सब देख रही हूँ
व्यथा को सह रही हूँ 
मेरी व्यथा किसी ने
अब तक नहीं समझी 
ना चाहते हुए भी
मुझे पाने की चाह में
किये जा रहे कुकृत्यों की
निरंतर साक्षी होती रही हूँ
आज भी हो रही हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
05-06-2012
567-17-06-12

पहली मुलाक़ात


उसके
पैरों  की पायल
हाथों की चूड़ियाँ
आज कुछ ज्यादा ही
खनक रही थी
चेहरे पर मुस्काराहट
कम होने का
नाम नहीं ले रही थी
ऐसा लग रहा था
चिड़िया को घोंसला
तडपती मछली को
पानी मिल गया
आज प्रियतम से
उसकी पहली
मुलाक़ात हुयी थी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
05-06-2012
566-16-06-12

बुधवार, 1 अगस्त 2012

इम्तहान



मेरी आवाज़
उसके कानों से
टकरा कर
वैसे ही लौट आती
जैसे बंद खिड़कियों के
 कमरे में
कितना भी चिल्लाओ
किसी को
सुनायी नहीं देता
आवाज़ खुद के कानों में
लौट कर
कोलाहल मचाती
कितनी भी विनती करूँ
कितना भी प्यार जताऊँ
वो मेरी बात का
कभी जवाब नहीं देती
ना मुझे अपने घर का
पता बताती
ना ही कभी बुलावा देती
निरंतर
 बेरहमी से तडपाती
ना जाने
कौन सा इम्तहान लेती
05-06-2012
565-15-06-12

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

नियत पर सवाल ना करो



पत्ता पत्ता बूटा बूटा
पहचानता मुझे
तितलियाँ भँवरे
सब जानते मुझे
फिजा तक
समझती मुझे
एक तुम ही हो
जो ना समझे
ना जाने मुझे
मुझे शक से देखते रहे
तोहमत लगाते रहे
खुद नफरत के
रास्ते पर चलते रहे
तंग दिली दिखाते रहे
अब मेरी भी
इल्तजा सुनलो
मुझ पर रहम करो
मेरी नियत पर
शक ना करो
गर नियत पर
शक,शुबहा करोगे
रोने लगेंगे चाँद
सितारे
सूख जायेंगे पत्ते बूटे
ग़ुम हो जायेंगे
तितलियाँ,भँवरे
फिर भी चाहो तो
मेरी जान ले लो 
पर नियत पर
सवाल ना करो

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
05-06-2012
564-14-06-12

झीना सा पर्दा



खूबसूरत
गुलाबी चेहरा
नागिन से लहराते बाल
झील सी गहरी
नीली आँखें
रस भरे पतले होठ
मचल करहवा में
उड़ता हुआ दुपट्टा
तितली जैसे
रंग बिरंगे परिधान में
परी लग रही थी
शिकारी से बेखबर
हिरनी की
मदमाती चाल से
चली आ रही थी
चाहते हुए भी उसे
छू नहीं सका
ख्वाब और हकीकत
के बीच
एक झीना सा पर्दा था
उधर वो थी ,इधर में था
ये हकीकत नहीं
रोज़ दिखने वाला 
ख्वाब था


 © डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
05-06-2012
563-13-06-12

सोमवार, 30 जुलाई 2012

मैं अनपढ़ ही ठीक हूँ


कभी स्कूल नहीं गया
किताब का 
एक अक्षर भी नहीं पढ़ा
लोगों को बोलते देखा
जो अच्छा लगा
उसका अनुसरण कर लिया
जो अच्छा नहीं लगा
उसे मष्तिष्क में आने
नहीं दिया
लोगों ने  अनपढ़
कह कर संबोधित किया
अपमानित होता रहा
खून का घूँट पी कर
किसी तरह अपना काम
चलाता रहा
अब उम्र के अंतिम
पड़ाव पर हूँ
कई बार मन में
विचार आता है
पढता लिखता तो
क्या और पा सकता था 
कहीं अनपढ़ रह कर
मैंने कुछ खोया तो नहीं
लेकिन जब
पढ़े लिखे लोगों को
असभ्य भाषा बोलते
दुर्व्यवहार करते
मान मर्यादा को
तार तार करते
रिश्तों की बली लेते
अपराध करते देखता हूँ
तो शर्म से गढ़ जाता हूँ
सोचता हूँ
उस शिक्षा का क्या लाभ
जिसमें इंसान
कुछ पैसे अधिक तो
कमा सकता है
पर इंसान सा
व्यवहार नहीं कर सकता
अपने आप से कहता हूँ
मैं अनपढ़ ही ठीक हूँ
कम से कम इंसान
बन कर तो रहता हूँ


 © डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
04-06-2012
562-12-06-12