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शनिवार, 28 जुलाई 2012

कैसे हाँ कहूँ ? जब न कहना चाहता हूँ ?



कैसे हाँ कहूँ 
?
जब न कहना चाहता हूँ ?
न भी कैसे कहूँ?
समझ नहीं पाता हूँ
झंझावत में फंसा हूँ
रिश्तों के 
बिगड़ने का खौफ
दुश्मनी मोल लेने का डर
मुझे न कहने से रोकता है
कैसे उसूलों को तोडूँ
मन को दुखी कर के 
हाँ कहूँ
दुविधा में फंसा हूँ
क्यों न एक बार
नम्रता से न कह दूं
सदा के लिए दुविधा से
मुक्ती पा लूँ
कुछ समय के लिए
लोगों को नाराज़ कर दूं
समय के अंतराल में
सब समझ जायेंगे
आदत समझ कर भूल
जायेंगे
मेरा मन खुश रहेगा
फिर हाँ न के झंझावत में
नहीं फंसेगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-06-2012
557-77-05-12
 (जीवन में अक्सर ऐसी स्थिति आती है जब इंसान ना कहना चाहता है,पर रिश्तों में कडवाहट के डर से घबराता है ,और अनुचित बात के लिए भी हाँ कह कर मन को दुखी करता है)

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

उजड़ गयी जब फसल सारी



उजड़ गयी
जब फसल सारी
तुम पूछते
खलिहान कहाँ है
बिखर चुका
जब परिवार सारा
तुम पूछते घर कहाँ है
खुद गए
रास्ते में गडडे
अब पूछते हो
रास्ता कहाँ हैं
कैसे बताऊँ
खुद ने ही मारी थी
कुल्हाड़ी
अपने पैरों पर
चढ़ाया था
सब को सर पर
समझाया था
कोई बड़ा नहीं
कोई छोटा नहीं
सब बराबर घर में

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-06-2012
556-76-05-12

बेचैनी का दामन थाम लिया



आज मैंने उन्हें
मुस्कराते देख लिया
खुद को
मोहब्बत के जाल में
फंसा दिया
हसरतों को न्योता
दे दिया
खुद की मुस्काराहट को
उनके नाम कर दिया
बेचैनी का दामन
थाम लिया
02-06-2012
555-75-05-12

घर की खामोशी



घर की खामोशी
हर पल दिल को
चीरने लगी
आपस में कलह
साफ़
दिखने लगी
सुबह को ही शाम
होने लगी
एक दूसरे पर ऊंगली
उठने लगी
प्रेम पर नफरत
हावी होने लगी
अहम् की जीत
हो गयी
अहम् ने
सत्ता हाथ में ले ली
परिवार के बिखरने की
रिश्तों के टूटने की 
शुरुआत हो गयी
02-06-2012
554-74-05-12

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

ये कैसी ज़िन्दगी?



ये कैसी ज़िन्दगी?
जिसमें रंग नहीं
खुशी नहीं 
गले मिल कर
हँसना नहीं
मिलजुल कर
रहना नहीं
कल क्या होगा?
कल क्या करना है?
कैसा बीतेगा समय?
इसी ऊहापोह में
गुजरता हर दिन
गिले शिकवे निरंतर
हावी रहते  दिमाग पर
ना मन को चैन
ना ह्रदय में खुशी
मजबूरी में
जिए जा रहे सब
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-06-2012
553-73-05-12

बुधवार, 25 जुलाई 2012

हर सुबह ऐसी ही होगी



सूरज ने 

अंगडाई ली
कोपलें हँसने लगी
ओस की बूँदें
चमकने लगी
मंद बयार चलने लगी
धूल उडाती गायें
चरने निकल पडी 
परिंदों ने मुनादी
कर दी
सुबह हो गयी
नयी नवेली दुल्हन ने
आँखें खोली
आधी नींद में
चुल्हा फूंकने लगी
क्या ज़िन्दगी भर
हर सुबह
ऐसी ही होगी  
विवाह के दूसरे दिन ही 
सोचने लगी 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-06-2012
552-72-05-12

सब आँखें बंद कर चल रहे हैं



सब आँखें
बंद कर चल रहे हैं
फिर भी गिरने से
डर रहे हैं
सुकून की तलाश में
नफरत के
शोले भड़का रहे हैं
काँटों की डगर को
फूलों की
सेज समझ रहे हैं
बंद पलकों से
सुनहरे सपने देख रहे हैं
खुद पत्थर मार रहे हैं
फूलों की ख्वाहिश
रख रहे हैं
सब आँखें
बंद कर चल रहे हैं
02-06-2012
551-71-05-12

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

प्रिये तुम्हारी मधुर वाणी में कोई गीत सुना दो



प्रिये तुम्हारी
मधुर वाणी में कोई
गीत सुना दो
मेरे अंतर्मन को
उल्लास से भर दो
खुशी के अंकुर को
प्रस्फुटित कर दो
निराशा के भावों को
आशा कि वर्षा से
धो दो
रोम रोम में विश्वास के
महकते पुष्पों को
पल्लवित कर दो
ह्रदय में प्रेम सरिता
प्रवाहित कर दो
जीवन को
उत्साह के रंगों से
भर दो
मुझे संताप से मुक्त
कर दो
प्रिये तुम्हारी
मधुर वाणी में कोई
गीत सुना दो

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
30-05-2012
550-70-05-12

बहुत व्यस्त थे हम



कई दिन के
इंतज़ार के बाद उनका
फ़ोन आया
ना देरी की माफी माँगी
ना ही कोई बहाना बनाया
बहुत व्यस्त थे हम
कह कर पीछा छुडाया
अभी ज़ल्दी में है
बाद में फुर्सत से बात करेंगे
कह कर फ़ोन बंद कर दिया
पहले जैसे ही
इस बार भी रुलाया
दिन रात याद  करने  का
बहाना मिल गया
फ़ोन करने का सिलसिला
शुरू हो गया
इस बार भी उन्होंने
ना फोन उठाया
ना ही याद किया
उम्मीद में भी
नाउम्मीदी का दौर
चलता रहा
मायूसी बढ़ती गयी
सोचा आखिरी बार
कोशिश कर लूं
सहमते हुए फ़ोन किया
तो मीठी आवाज़ से
स्वागत हुआ
आपने याद किया
देख भी लिया था
पर क्या करें
बात नहीं कर सके
बहुत व्यस्त थे हम
30-05-2012
549-69-05-12

सोमवार, 23 जुलाई 2012

उनसे मेरी मुलाक़ात करा दे



खुदा से इल्तजा है
ज़िन्दगी की चादर से
हसरतों की नाकामियों के
दाग मिटा दे
सूखे हुए आंसूओं को
कामयाबी के पानी से
धो दे
मोहब्बत के सफ़र में
 गिरता पड़ता रहा हूँ
राह को थोड़ा आसान
बना दे
उनसे मेरी मुलाक़ात
करा दे
तडपते हुए दिल को
सुकून दे दे
30-05-2012
548-68-05-12

रविवार, 22 जुलाई 2012

हम खुश किस्मत हैं,हमें गाँधी,सुभाष मिले


हम खुश किस्मत हैं
हमें गाँधी,सुभाष 
पटेल,शास्त्री मिले
हम आज़ाद  हुए
हमें गणतंत्र मिला,
प्रजातंत्र  मिला
फिर इतने बदकिस्मत
कैसे हो गए
भ्रष्ट और स्वार्थी
नेताओं का राज मिला
ऊपर जाऊंगा तब
इश्वर से पूछूंगा 
ये अंग्रेजों की
बद्दुआ का असर है
या हमारे कर्मों का
फल है
30-05-2012
547-67-05-12

हसरतों की नुमाइश



कोई कह रहा था
वो हमें
याद तक नहीं करते
ना जाने हकीकत
बता रहा था
या दिल जला रहा था
इतना ज़रूर पता है
खुद की हसरतों की
नुमाइश 
ज़रूर कर रहा था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
30-05-2012
546-66-05-12

बुढापा ऐसा ही होता है



पुराने पेड़ को देखा तो
किसी बूढ़े सा नज़र आया
मोटा तना उम्र बता रहा था
कम डालियाँ,कम पत्ते
समय की कहानी दर्शा रहे थे
ऐसा लगा बूढा शरीर
बिना वस्त्राभूषण मजबूरी में
जिए जा रहा हो
गौर से देखा
कोई घोंसला तो नहीं दिखा
दो तीन पक्षी अवश्य दिखे
जिन्होंने बसेरे तो किसी
पत्तियों से भरे पेड़ पर
बसा लिए
ऐसा प्रतीत हुआ
पुराने रिश्ते निभाने आये हैं
मैं समझ गया
पक्षियों को भी पता चल गया
अब पेड़ के  जाने का समय
आ गया है
जाते जाते मिलने की
रस्म पूरी करते रहो
थोड़ी बहत खुशी देते रहो
द्रश्य को देख कर
मुझे ध्यान आया
बुढापा ऐसा ही होता है
बहुत कम संगी साथी
शरीर बीमार,
अपनों की कमी
कभी कोई मिलने आ जाए
तो ह्रदय खुशी से भर जाए
नहीं तो अकेले ठूंठ से
खड़े रहो
समय काटते रहो
संसार से जाने का
इंतज़ार करते रहो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
30-05-2012
545-65-05-12